करीब चार दशक तक भारतीय राजनीति और न्याय व्यवस्था में चर्चा का केंद्र रहा बोफोर्स मामले का अब कानूनी अंत हो चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली आखिरी लंबित याचिका खारिज कर दी. इस फैसले के साथ ही हिंदुजा बंधुओं और स्वीडिश हथियार कंपनी एबी बोफोर्स से जुड़े केस को दोबारा खोलने की कोशिश पर भी विराम लग गया. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले में इतने लंबे समय बाद आगे की सुनवाई की जरूरत पर सवाल उठाया. बोफोर्स केस की फाइल बंद होने के बाद अब ये मामला इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है. आइए जानते हैं क्या था ये घोटाला, जिसने हिला दी थी राजीव गांधी सरकार की नींव.
क्या बोफोर्स घोटाला?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बोफोर्स विवाद की शुरुआत 24 मार्च 1986 को हुई. इसी दिन तत्कालीन भारत सरकार ने स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स से 400 बोफोर्स 155 एमएम हॉवित्जर तोपें खरीदने के लिए करीब 1437 करोड़ रुपये का समझौता किया. अगले ही साल स्वीडिश रेडियो की एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि सौदे को हासिल करने के लिए कथित तौर पर करीब 64 करोड़ रुपये की अवैध दलाली दी गई. रिपोर्ट में दावा किया गया कि तोप बनाने वाली कंपनी एबी बोफोर्स ने भारत सरकार के बड़े नेताओं और रक्षा विभाग के अधिकारियों को घूस खिलाई थी. इसके बाद यह मामला देश के सबसे बड़े राजनीतिक विवादों में बदल गया.
यह भी पढे़ं: ‘टेंशन मत लीजिए, मैं हूं आपके साथ’, 45 बागी सांसदों से बोले PM मोदी, ब्रेकफास्ट मीटिंग में दिखे TMC से आए सांसद
घोटाले ने हिलाई राजीव गांधी सरकार की नींव
स्वीडिश रेडियो की रिपोर्ट से तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनकी सरकार की छवि प्रभावित हुई और विपक्ष ने भी इस मामले को लेकर निशाना साधा. उस समय के रक्षा मंत्री वीपी सिंह को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. इसके सामने कई और आरोप लगे जिसने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया. बोफोर्स के चलते 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी को नुकसान उठाना पड़ा और कांग्रेस चुनाव हार गई. बोफोर्स घोटाला केस में राजीव गांधी समेत कई बड़े नेताओं पर आरोप लगे, लेकिन उन आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिल सके.
2005 में ही खत्म हो चुका था केस
आपको बता दें कि इस मामले में CBI ने जनवरी 1990 में FIR दर्ज कर जांच शुरू की. करीब एक दशक की जांच के बाद 1999 में चार्जशीट दाखिल की गई. हालांकि 31 मई 2005 को दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही खत्म कर दी. अदालत ने अभियोजन के पास आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत नहीं होने की बात कही थी.
यह भी पढ़ें: Video: अभिजीत दीपके ने चुनाव आयोग पर उठाए सवाल, बोले- लोकतंत्र ऐसे नहीं चलेगा, तय करनी पड़ेगी जवाबदेही
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन CBI की अपील भी लंबे विलंब के कारण 2018 में खारिज हो गई. सुप्रीम कोर्ट ने उस समय 4,522 दिनों की देरी को गंभीरता से लिया और कहा कि देरी की पर्याप्त वजह नहीं बताई गई.
चार दशक बाद सुप्रीम कोर्ट ने लगाया फुल स्टॉप
बोफोर्स मामले में जांच एजेंसी और अन्य पक्षों की ओर से समय-समय पर मामले को दोबारा खोलने की कोशिश होती रही, लेकिन कोर्ट में आरोपों को सही साबित करने वाली कड़ी आज तक नहीं बन सकी. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के साथ इस मामले से जुड़ी आखिरी कानूनी चुनौती भी खत्म हो गई है. बोफोर्स अब सिर्फ एक अदालती मामला नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार, रक्षा सौदों और सत्ता की जवाबदेही पर दशकों तक चली बहस की एक मिसाल के रूप में इतिहास में दर्ज हो गया है.
संबंधित खबरें
क्या है संविधान का अनुच्छेद 32, राहुल गांधी ने इसके तहत क्यों डाली याचिका?
14 hrs agoदुनिया की 8वीं सबसे महंगी सेना, फिर भी चंद हूतियों के आगे क्यों बेबस सऊदी?
14 hrs agoसिंहासन हिला रहे 'Gen-Z'! भारत से फ्रांस तक सड़कों पर कैसे उतरे युवा?
15 hrs agoअटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की नियुक्ति की क्या है पूरी प्रक्रिया
1 day agoदिल्ली में जंतर मंतर को प्रोटेस्ट लिस्ट से क्यों हटाया? तय किए 3 नए स्थल
1 day agoजेपी आंदोलन से CJP प्रदर्शन तक का सफर
3 days agoरेलवे स्टेशन का नाम कैसे बदला जाता है? जानें क्या है पूरी प्रक्रिया
4 days agoनोबेल पुरस्कार विजेताओं को 'लॉरिएट' क्यों कहा जाता है? दिलचस्प है कहानी
5 days agoविदेश यात्रा पर क्यों जाते हैं CM, उन्हें भी लेनी पड़ती है किसी की मंजूरी?
6 days agoब्राजील के चुनाव में फंसा पेंच, क्या है 'रनऑफ' प्रक्रिया जिसमें होगा फैसला?
7 days agoन्यूज 24 पर पढ़ें देश, राष्ट्रीय समाचार (National News), खेल, मनोरंजन, धर्म, लाइफ़स्टाइल, हेल्थ, शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और लेटेस्ट अपडेट के लिए News 24 App डाउनलोड कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।
First published on:
Know More: Editorial Guidelines