मिडिल ईस्ट में दो सप्ताह का सीजफायर तो हो गया, लेकिन सवाल यह है कि आखिर ईरान पर हमले के लिए अमेरिका कैसे इजरायल के साथ आ गया. 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह कहानी शुरू हुई 11 फरवरी से, जब इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू व्हाइट हाउस पहुंचे और साथ में उन्होंने ट्रंप की मेज पर 'ईरान को खत्म करने' का ब्लूप्रिंट रखा. उस दिन से पहले अमेरिका को ईरान से ऐसी कोई दिक्कत नहीं थी, कि वह उस पर हमला कर देता.

व्हाइट हाउस की वो 'सीक्रेट' मीटिंग

रिपोर्ट के मुताबिक, उस दिन नेतन्याहू अकेले नहीं थे. उनके साथ ईरान पर हमला करने का प्लान भी था. बैठक में अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, सीआईए प्रमुख जॉन रैटक्लिफ जॉइंट, चीफ ऑफ स्टाफ के चेयरपर्सन जनरल डैन केन और व्हाइट हाउस चीफ ऑफ स्टाफ सूजी विल्स जैसे दिग्गज मौजूद थे. उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस उस वक्त अजरबैजान में थे, वे बैठक में नहीं थे. वीडियो कॉल के जरिए भी उन्हें शामिल नहीं किया गया.

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इजराइल की तरफ से, उसकी जासूसी एजेंसी मोसाद के चीफ डेविड बार्निया और दूसरे मिलिट्री अधिकारी वीडियो कॉल के जरिए बैठक में जुड़े थे.

नेतन्याहू ने एक घंटे तक ट्रंप को यह समझाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी कि ईरान अब 'शासन परिवर्तन' के लिए पूरी तरह तैयार है. इजरायल का दावा था कि ईरान के मिसाइल प्रोग्राम को कुछ ही हफ्तों में तबाह किया जा सकता है और ईरानी जनता खुद अपने शासकों के खिलाफ खड़ी हो जाएगी.

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ट्रंप की टीम ने बताया था बकवास

जहां ट्रंप नेतन्याहू की बातों से प्रभावित दिख रहे थे, वहीं उनके अपने सलाहकार इस योजना को लेकर उनसे सहमत नहीं थे. अगले दिन, 12 फरवरी को जब ट्रंप की टीम ने इस खुफिया जानकारी का विश्लेषण किया, तो सीआईए निदेशक ने नेतन्याहू के 'शासन परिवर्तन' वाले प्लान को 'हास्यास्पद' करार दिया.

बात यहीं नहीं रुकी, विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने तो प्लान को 'बकवास' तक बता दिया. उनका मानना था कि सीधे युद्ध के बजाय 'अधिकतम दबाव' की नीति ही बेहतर है. यहां तक कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी चेतावनी दी थी कि शासन परिवर्तन वाला युद्ध एक आपदा साबित होगा और ट्रंप के उन मतदाताओं के साथ विश्वासघात होगा जिन्होंने 'नो न्यू वॉर्स' के वादे पर उन्हें वोट दिया था.

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ट्रंप की जिद

ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल डैन केन ने तो ट्रंप को साफ तौर पर चेताया था कि इजरायल अपनी योजनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आदी है. उन्होंने बताया था कि यूक्रेन और इजरायल की मदद के बाद अमेरिका का अपना हथियारों का भंडार कम हो चुका है.

लेकिन ट्रंप के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. उन्हें लगा कि ईरान भी वेनेजुएला की तरह जल्दी घुटने टेक देगा. वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को पकड़े जाने की घटना उनके मन पर हावी थी. करीबियों के विरोध के बावजूद, ट्रंप ने 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' को हरी झंडी दे दी.

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जंग से निकला क्या?

ईरान-अमेरिका जंग का नतीजा सबके सामने है. नेतन्याहू का यह आकलन कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट को बंद नहीं कर पाएगा, पूरी तरह गलत साबित हुआ. ईरान ने न केवल ग्लोबल ऑयल सप्लाई को ठप कर दिया, बल्कि इस युद्ध ने अब तक 2,000 से अधिक लोगों की जान ले ली है.