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DUSU Elections: दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की कैसे हुई थी शुरुआत? भारत की आजादी से महज 9 दिन पहले रखी गई नींव

दौरान डूसू के लिए संविधान तैयार होने और पहली बार चुनाव कराए जाने का भी जिक्र मिलता है. बाद के वर्षों में छात्र संघ के कामकाज और वित्तीय व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित करने के लिए नियमों में बदलाव किए गए.

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भारत की आजादी से पहले शुरू हुई थी DUSU की जर्नी. (Photo: ANI)

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) 2026-27 के चुनाव का परिणाम सामने आ गया है. इस बार के डूसू चुनावों में चार में से तीन सीटों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने कब्जा कर लिया है, जबकि एक सीट निर्दलीय के खाते में गई है. हैरानी की बात ये है कि एनएसयूआई इस साल खाता खोलने में नाकाम रही और एक भी सीट पर उसके उम्मीदवारों को विजय नहीं मिली. चुनावी चर्चाओं के बीच गूगल से लेकर सोशल मीडिया तक लोग डूसू के इतिहास के बारे में सर्च कर रहे हैं. तो आइए हम आपको बताते हैं कि आखिर DUSU की नींव कब रखी गई थी?

भारत की आजादी से पहले शुरू हुई जर्नी

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि डूसू की नींव भारत की आजादी से पहले रखी गई थी. बहुत कम लोग जानते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) की जर्नी 6 अगस्त 1947 से शुरू हुई थी. इसी दिन दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने कार्यकारी परिषद को बताया था कि विद्यार्थी अपना विश्वविद्यालय छात्र संघ स्थापित करना चाहते हैं. परिषद ने प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी देते हुए चुनावी प्रक्रिया और व्यवस्था के लिए संविधान और जरूरी प्रक्रियाओं का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति बनाने की बात कही.

यह भी पढ़ें: DUSU चुनाव में ABVP ने 4 में से 3 पद जीते, जानें कौन बना अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, संयुक्त सचिव और सचिव

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महज 150 रुपये का ग्रांट देने का प्रस्ताव

छात्र संघ के शुरुआती खर्च के लिए विश्वविद्यालय की ओर से महज 150 रुपये का ग्रांट देने का प्रस्ताव भी रखा गया था. यही छोटा-सा आर्थिक सहयोग आगे चलकर एक ऐसे छात्र निकाय की नींव बना, जिसके चुनाव आज राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरते हैं. हालांकि डूसू के शुरुआती वर्षों में आर्थिक स्थिति चुनौतीपूर्ण रही. 1953 में विश्वविद्यालय की कार्यकारी समिति ने छात्र संघ को मिलने वाले अनुदान पर विचार किया और कहा कि संघ को धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करनी चाहिए. मार्च 1954 तक छात्र संघ की आय 815 रुपये थी, जबकि खर्च 1,995 रुपये तक पहुंच गया था.

1973 में बदला संवैधानिक ढांचा

इसी दौरान डूसू के लिए संविधान तैयार होने और पहली बार चुनाव कराए जाने का भी जिक्र मिलता है. बाद के वर्षों में छात्र संघ के कामकाज और वित्तीय व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित करने के लिए नियमों में बदलाव किए गए. 2 अगस्त 1973 को विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद ने डूसू के मौजूदा संविधान को खत्म कर अंतरिम संविधान लागू करने के प्रस्ताव पर विचार किया. इसमें वित्तीय नियंत्रण के साथ प्रशासनिक ढांचा भी निर्धारित किया गया. कुलपति को छात्र संघ का संरक्षक बनाया गया, जबकि शिक्षक सलाहकार और कोषाध्यक्ष जैसे पदों की व्यवस्था की गई. संविधान में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और सहायक सचिव के चार निर्वाचित पद रखे गए. इनका चुनाव छात्र सीधे साधारण बहुमत से करते थे.

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लेखक के बारे में

Akarsh Shukla

आकर्ष शुक्ला न्यूज 24 के साथ बतौर चीफ सब एडिटर जुड़े हुए हैं. मूल रूप से नोएडा, उत्तर प्रदेश के रहने वाले आकर्ष ने पत्रकारिता का सफर 2016 में प्रिंट मीडिया से शुरू हुआ, बाद में उन्होंने डिजिटल मीडिया का रुख किया. आकर्ष शुक्ला ने गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUS&T) हिसार, हरियाणा से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री हासिल की. आकर्ष ने दिल्ली के अखबार वूमेन एक्सप्रेस में काम किया. इसके बाद नवोदय टाइम्स, ओपेरा न्यूज, वनइंडिया, इंडिया डॉट कॉम (जी मीडिया ग्रुप) में विभिन्न पदों पर कार्य किया. आकर्ष शुक्ला अक्टूबर, 2025 से न्यूज24 से जुड़े हुए हैं, जहां वो मुख्य रूप से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय और राजनीति से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं. इसके साथ ही आकर्ष शिफ्ट हेड के तौर पर टीम का नेतृत्व भी करते हैं. आकर्ष ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के अलावा संसद से जुड़ी खबरों को कवर किया है. उनकी राजनीति में गहरी रुचि है, इस कारण वह राजनीति से जुड़ी खबरों को आसान शब्दों में लिखने में माहिर हैं. डिग्री और डिप्लोमा: आकर्ष शुक्ला ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक (BA) की डिग्री के बाद गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUS&T) हिसार, हरियाणा से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन (MJMC) पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. आकर्ष शुक्ला ने DICS इंस्टीट्यूट से कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में 2 साल का डिप्लोमा भी किया है. पत्रकारिता में अनुभव: 10 वर्ष से अधिक
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