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1991 RBI Secret Operation: рдЬрдм рджрд┐рд╡рд╛рд▓рд┐рдпрд╛ рд╣реЛрдиреЗ рдХреА рдХрдЧрд╛рд░ рдкрд░ рдерд╛ рднрд╛рд░рдд, рдЖрдзреА рд░рд╛рдд рдЪреЛрд░реА рдЫрд┐рдкреЗ рд╡рд┐рджреЗрд╢ рдЙрдбрд╝рд╛рдпрд╛ рдЧрдпрд╛ рдерд╛ 47000 рдХрд┐рд▓реЛ рд╕реЛрдирд╛

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8 जुलाई, 1991 को देश के एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक द इंडियन एक्सप्रेस के मुखपृष्ठ पर छपी इस एक सुर्खी ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। अखबार के पन्नों पर बॉम्बे (अब मुंबई) के सांताक्रूज हवाई अड्डे पर एक भारी-भरकम मालवाहक विमान में भारी लोहे के बक्से लादे जाने की धुंधली सी तस्वीर थी। यह भारत के इतिहास का वह दौर था, जब देश के आम नागरिकों और दुनिया को पहली बार पता चला कि भारत सरकार ने संप्रभु डिफॉल्ट (दिवालिया होने) से बचने के लिए अपने देश का गौरव यानी रिजर्व बैंक का सुरक्षित सोना, गुपचुप तरीके से गिरवी रखकर विदेश भेजना शुरू कर दिया है।

यह कहानी भारत के अब तक के सबसे बड़े आर्थिक संकट, एक बेहद गोपनीय सुरक्षा मिशन और अंततः भारत के आर्थिक उदारीकरण (Liberalisation) की नींव बनने की है।

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1991 में कैसे कंगाल हुआ भारत?

साल 1990 और 1991 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह ढहने के कगार पर थी। देश राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था और विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) लगातार खाली हो रहा था। इस आग में घी डालने का काम किया जनवरी 1991 के खाड़ी युद्ध (Gulf War) ने।

खाड़ी युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। इराक द्वारा कुवैत के 750 तेल कुओं में लगाई गई आग नौ महीनों तक सुलगती रही, जिससे हिमालय पर काली बारिश तक दर्ज की गई थी। इस संकट ने खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों के रोजगार को छीन लिया, जिससे भारत आने वाला विदेशी पैसा (Remittances) अचानक रुक गया।

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1991 की गर्मियों तक स्थिति यह हो गई थी कि भारत के पास केवल एक सप्ताह के आयात (जैसे तेल और दवाएं खरीदने) के लिए ही डॉलर बचे थे। अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने भारत की साख को जंक (घटिया) श्रेणी में डाल दिया। कोई भी विदेशी बैंक या देश भारत को आपातकालीन कर्ज देने के लिए तैयार नहीं था।

आरबीआई का सीक्रेट ऑपरेशन: तीन चरणों की रणनीति
पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली नई अल्पसंख्यक सरकार के गठन के समय देश के कैबिनेट सचिव नरेश चंद्रा ने प्रधानमंत्री को दो नोट सौंपे थे – एक जिसमें आर्थिक तबाही का ब्योरा था और दूसरा जिसमें देश को बचाने का ब्लूप्रिंट।

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तत्कालीन आरबीआई डिप्टी गवर्नर सी. रंगराजन (जो बाद में गवर्नर बने) ने अपनी आत्मकथा फोर्क्स इन द रोड: माई डेज एट आरबीआई में लिखा है कि संप्रभु डिफॉल्ट को रोकने का एकमात्र और सबसे तेज तरीका सोने का इस्तेमाल करना था। इसके लिए तीन कदम उठाए गए:

सोने का पुनर्मूल्यांकन: सबसे पहले आरबीआई के सोने का बाजार मूल्य के आधार पर नया मूल्यांकन किया गया।

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जब्त सोने का सौदा: मई 1991 में सरकार ने तस्करी से जब्त किए गए 20 टन सोने को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के माध्यम से यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड के पास स्वाइप किया, जिससे करीब 215 मिलियन डॉलर जुटाए गए।

आरबीआई रिजर्व को गिरवी रखना : क्‍योंक‍ि यह रकम पर्याप्त नहीं थी, इसलिए चंद्रशेखर की तत्कालीन कार्यवाहक सरकार की अनुमति से आरबीआई ने अपने खुद के स्वर्ण भंडार को गिरवी रखने का साहसिक और संवेदनशील फैसला लिया।

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बेहद गोपनीयता और आधी रात का मिशन
आरबीआई के नियमों के मुताबिक, भारत केवल किसी अन्य केंद्रीय बैंक (Currency Authority) से ही कर्ज ले सकता था। इसके लिए बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान को चुना गया।

लेकिन ऑपरेशन में कई व्यावहारिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां थीं। आरबीआई के पास मौजूद सोने की ईंटें और सिल्लियां लंदन गुड डिलीवरी (London Good Delivery) मानकों के अनुरूप नहीं थीं। अधिकारियों को बेहद कम समय में, बिना किसी को भनक लगे, इस सोने को तौलना, छांटना, दोबारा पैक करना और उसका बीमा कराना था।

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4 जुलाई, 1991 से आरबीआई ने मुंबई के अपने वॉल्ट से भारी सुरक्षा और बख्तरबंद वाहनों के काफिले में सोने को सांताक्रूज हवाई अड्डे पर पहुंचाना शुरू किया। यह मिशन इतना गोपनीय था कि सीमा शुल्क (Customs) नियमों के तहत दी जाने वाली अनिवार्य घोषणा को बाईपास करने के लिए वित्त मंत्रालय से विशेष अनुमति ली गई थी। कुल चार खेपों में 46.91 टन (लगभग 47,000 किलोग्राम) सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड भेजा गया, जिसके बदले भारत को 405 मिलियन डॉलर का आपातकालीन ऋण मिला।

क्या वह सोना कभी भारत वापस आया?
इस खबर के सार्वजनिक होने के बाद देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। भारत में सोने को केवल एक धातु नहीं, बल्कि पारिवारिक सुरक्षा और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। सरकार के इस कदम को कई लोगों ने राष्ट्रीय अपमान के रूप में देखा।

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हालांकि, यह कड़वी दवा काम कर गई। भारत ने समय पर अपने अंतरराष्ट्रीय भुगतानों को चुकाया और दिवालिया होने के कलंक से बच गया। नरसिम्हा राव सरकार और तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने इसके तुरंत बाद ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों (LPG – लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन) की घोषणा की, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था के द्वार दुनिया के लिए खोल दिए।

नवंबर 1991 तक भारत ने बैंक ऑफ इंग्लैंड का पूरा कर्ज चुका दिया और सोने का कानूनी स्वामित्व वापस पा लिया। हालांकि, सी. रंगराजन के अनुसार, उस समय परिवहन के भारी खर्च को बचाने के लिए सोने को भौतिक रूप से वापस भारत लाने के बजाय विदेशी वॉल्ट में ही सुरक्षित रखा गया, लेकिन वह आरबीआई की संपत्ति के रूप में गिना जाता रहा।

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1991 बनाम 2026: एक ऐतिहासिक बदलाव
पिछले तीन दशकों में भारत की आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण धारकों और उपभोक्ताओं में से एक है।

स्वर्ण भंडार में उछाल: जहां 1991 में भारत को 47 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था, वहीं मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, आरबीआई के पास अब 880.52 मीट्रिक टन सोना सुरक्षित है, जिसकी कीमत 115 अरब डॉलर से अधिक है।

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सोने की घर वापसी: पिछले कुछ वर्षों में आरबीआई ने अपनी रणनीति बदलते हुए विदेशों में रखे अपने सोने को वापस देश में लाना शुरू किया है। आज भारत के कुल स्वर्ण भंडार का 77% (लगभग 680 टन) हिस्सा घरेलू वॉल्ट में सुरक्षित रखा गया है, जो मार्च 2023 में महज 38% था।

मौजूदा दौर की चुनौतियां
इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन एक अलग रूप में। आज (मई 2026 में) भी भारत मध्य पूर्व में जारी अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी मुद्रा के दबाव से जूझ रहा है।

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इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक विशेष अपील की है कि वे कम से कम एक साल के लिए गैर-जरूरी सोने की खरीदारी को टाल दें, ताकि देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex) और भारतीय रुपये पर दबाव को कम किया जा सके। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 72 अरब डॉलर का सोना आयात किया है, जो 1991 में गिरवी रखकर जुटाए गए 405 मिलियन डॉलर की तुलना में लगभग 178 गुना अधिक है।

1991 का वह गुप्त ऑपरेशन भले ही देश के लिए एक बड़ा झटका था, लेकिन उसने भारत को आत्मनिर्भर बनने और अपनी आर्थिक नीतियों को नए सिरे से परिभाषित करने का सबसे बड़ा सबक दिया।

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First published on: May 18, 2026 08:13 AM

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Vandana Bharti

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