Bloody Daddy Review: एक बैग के लिए चूहे-बिल्ली का खेल, फिल्म में मिलेगा एक्शन का डबल डोज
Edited By Nancy Tomar

Bloody Daddy Review
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Bloody Daddy Review
अश्वनी कुमार: ड्रग माफिया और नॉरकोटिक्स पर हिंदुस्तान पर फिल्में कम ही बनती हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से जैसे नॉरकोटिक्स डिपॉर्टमेंट ने ड्रग्स को लेकर सेलिब्रिटीज को निशाने पर लेना शुरु किया है।
कम से ऑडियंस की दिलचस्पी इस ओर कुछ ज़्यादा ही हो गई है और फिर कुछ केसेज ने नारकोटिक्स डिपॉर्टमेंट के काम करने के तरीके पर ऐसे सवाल उठा दिए हैं कि जुर्म करने वाले और उसे रोकने वाले के बीच का फर्क समझ आना बंद हो गया है।
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‘BLOODY DADDY’ का हांलाकि इन रीयल स्टोरीज से कोई लेना-देना नहीं है। ये फ्रेंच फिल्म ‘नुई ब्लॉन्श’ का हिंदी एडॉप्टेशन है। वैसे इसी फिल्म का एक वर्जन तमिल में कमल हासन के साथ बन चुका है। अली अब्बास जफर जिनकी हर फिल्म पिछली फिल्म से बिल्कुल जुदा होती है वो दिल्ली के आस-पास ड्रग लॉर्ड्स की ऐसी दुनिया रची है जो किसी अंदाज में मैक्सिको के ड्रग लॉर्ड्स से कम नहीं लगती।
‘BLOODY DADDY’ की कहानी शुरु होती है सुबह-सवेरे दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस पर हुए एक शूट-आउट से जहां सुमैर और जग्गी मास्क पहनकर एक दूसरी गाड़ी पर हमला करते हैं और 50 करोड़ की कोकीन से भरा एक बैग लेकर गायब हो जाते हैं। इस शूट आउट से बचकर निकला एक पेडलर सुमैर को पहचान लेता है और इसके साथ शुरु हो जाता है ड्रग माफिया और सुमैर के बीच उस बैग को वापस हासिल करने के लिए चूहे-बिल्ली का खेल।
इस खेल में सुमैर के बेटे को गुंडगांव के एक होटल से अगवा कर लिया जाता है। अब सुमैर को वो बैग एक सेवेन स्टार होटल में ड्रग लॉर्ड सिकंदर तक पहुंचाना है। सिकंदर के होटल में एक बड़ी शादी हो रही है, जिसमें कोरोना के दौर में एंटीजेन टेस्ट के साथ स्क्रीनिंग करके मेहमान आ रहे हैं।
पार्टी शबाब पर है और शादी से ज़्यादा दुल्हा-दुल्हन बादशाह की परफॉरमेंस के लिए एक्साइटेड हैं। चंद सीन्स के बाद ही ये एक रात की कहानी सिर्फ होटल के अंदर सिमट जाती है और इतनी तेज रफ्तार से भागती है कि आपने पलक झपकी और फिर आपको बैक करके सेक्वेंस देखना होगा।
सुमैर और सिकंदर के बीच कोकीन से भरे बैग को लेकर खेल चल रहा है, उसमें उसका बेटा कैद में लैक्टोज फ्री मिल्क टॉपिंग वाले चॉकलेट शेक की डिमांड कर रहा है। नॉरकोटिक्स का सीनियर ऑफिसर उस बैग को उड़ा ले जाने की फिराक में है। दूसरा गैंगस्टर इस ड्रग्स की कीमत चुकाने के बाद सिकंदर पर भड़क रहा है।
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सीन दर सीन आदित्य बसु और अली अब्बास जफर ने इस कहानी में डार्क कॉमेडी वाले फ्लेवर के झटके भी मारे हैं। खास तौर पर उन्होंने सुमैर के किरदार में जो कॉन्ट्रास्ट रखा है, जिसमें एक पल में वो बिल्कुल करप्ट नजर आता है और दूसरे ही पल में अपनी कमी, अपने गुस्से और अपने करप्शन को बैलेंस करता है, वो आपकी दिलचस्पी फिल्म में बनाए रखता है।
तकरीबन 2 घंटे की इस फिल्म में आपको राइटर-डायरेक्टर ने किसी किरदार की बैकस्टोरी समझाने की कोशिश नहीं की है। कोई फ्लैश बैक नहीं है, बस जो हो रहा है, वो बहुत तेज हो रहा है और एक्शन तो पूछिए नहीं, क्या शानदार तरीके से डिजाइन किया गया है।
स्टीवन की एडीटिंग फिल्म की रफ्तार को बनाए रखती है और मारसिन लास्काविएक के सिनमैटोग्राफी दिल्ली और गुडंगाव की लोकेशन को भी इंटरनेशनल अपील देती है। ‘BLOODY DADDY’ का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है, ना जबरदस्ती के गाने और कोई ठूंस कर दिखाया गया रोमांस और क्लाइमेक्स में बादशाह के गाने के साथ मिक्स हुए एक्शन सेक्वेंस, एनर्जी को बढ़ा देते हैं।
शाहिद कपूर ने सुमैर के कैरेक्टर में जो ‘ब्लडी’ ब्रिलिएंट परफॉरमेंस दी है, वो उन्हें एक्शन हीरोज की लीग में बहुत आगे लाकर खड़ा कर देता है। राजीव खंडेलवाल ने एक करप्ट नॉरको ऑफिसर के कैरेक्टर में बिल्कुल गिरगिट जैसा काम किया है। ड्रग लॉर्ड सिकंदर बने रोनित के कैरेक्टर में डॉर्क कॉमेडी वाला अंदाज कमाल का है। संजय कपूर और डायना पेंटी की भी अपने किरदारों पर अच्छी पकड़ है।
‘BLOODY DADDY’, परफेक्ट नहीं है, लेकिन ड्रग माफिया पर बेस्ड क्राइम थ्रिलर की कैटेगरी में आप इससे ज्यादा की उम्मीद लगा भी सकते। वीकेंड पर बिंज-वॉच के लिए ये अच्छा ऑप्शन है। ‘BLOODY DADDY’ को 3 स्टार।
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