पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसका असर दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है. 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए संकट और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं.
इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत ने आम उपभोक्ताओं पर बहुत बड़ा बोझ नहीं डाला है. 23 फरवरी से 19 मई 2026 के बीच भारत में पेट्रोल की कीमतों में सिर्फ 4.2% और डीजल में 4.4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में की गई बढ़ोतरी वाले देशों में की गई सबसे कम वृद्धि है.
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28 फ़रवरी से लेकर आज तक की स्थिति में कई देशों में ईंधन की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला. म्यांमार में पेट्रोल 89.7% और डीजल 112.7%, मलेशिया में पेट्रोल 56.3%, पाकिस्तान में 54.9%, जबकि अमेरिका में पेट्रोल 44.5% तक महंगा हुआ.
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वहीं, भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने करीब 76 दिनों तक अंतरराष्ट्रीय कीमतों का पूरा बोझ खुद वहन किया, जिससे आम जनता पर सीधा असर नहीं पड़ा. बताया जा रहा है कि कंपनियों ने इस दौरान प्रतिदिन लगभग 1000 करोड़ रुपये तक की अंडर-रिकवरी झेली.
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भारत में हालिया 3.91 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी वैश्विक हालात को देखते हुए बेहद सीमित है. यह वृद्धि सिर्फ आंशिक लागत समायोजन है, जबकि दुनिया के कई देशों में कीमतें 20% से 90% तक बढ़ चुकी हैं. हालाकि इस बढ़ोतरी के वाबजूद तेल कंपनियों को रोजाना 750 करोड़ का नुकसान हो रहा है . ऐसे में संभव है की आने वाले दिनों में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुछ और इज़ाफ़ा हो.