अमेरिका और ईरान के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते का जहां दुनिया भर में स्वागत किया जा रहा है, वहीं खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगी इजरायल ने इस पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी है. इस समझौते से पश्चिमी एशिया में शांति और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही की उम्मीदें जरूर बढ़ी हैं, लेकिन इजरायल इस कूटनीतिक कदम से बेहद असहज और नाराज नजर आ रहा है. अमेरिका-ईरान के बीच शांति समझौते के सहमति पत्र (MoU) पर हस्ताक्षर होने की पुष्टि से पहले ही इजरायल की टॉप लीडरशिप ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इस डील के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

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'हम पर लागू नहीं होता ट्रंप का समझौता'


इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार के मंत्रियों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित यह समझौता इजरायल पर लागू नहीं होगा. इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर लिखा, 'ट्रंप का समझौता हमें नहीं बांधता. इजरायल अमेरिका के अधीन नहीं है, हम एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र हैं.' उन्होंने आक्रामक लहजे में कहा कि इजरायल कोई 'बनाना रिपब्लिक' नहीं है और वे किसी ऐसे समझौते के भागीदार नहीं बन सकते जो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित न करता हो. बेन-ग्विर ने साफ किया कि हिजबुल्लाह के खात्मे और सीमावर्ती इलाकों से आतंकी बुनियादी ढांचे को पूरी तरह साफ करने से कम पर कोई समझौता नहीं होगा.

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'फुल फोर्स' से पलटवार की चेतावनी


इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि इजरायल लेबनान, सीरिया और गाजा पट्टी से अपनी सेना नहीं हटाएगा. काट्ज ने कहा, 'सुरक्षा क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखना हमारी सेना (IDF) की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है, इसलिए हम लेबनान से पीछे हटने का विरोध करते हैं.' उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान ने लेबनान में जारी इजरायली सैन्य अभियान को लेकर कोई जवाबी कार्रवाई की, तो तेल अवीव 'पूरी ताकत' से उसका जवाब देगा. वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच ने भी इस समझौते को इजरायल और स्वतंत्र दुनिया के लिए 'बुरा' बताते हुए कहा कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए इजरायल को अपने रचनात्मक तरीकों से अभियान जारी रखना होगा.

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