ईरान पर जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर हमला किया, तो बौखलाई तेहरान सरकार ने अपने पड़ोसी देशों में मौजूद अमेरिकी एयरबेस पर हमला करना शुरू कर दिया. ईरान ने बहरीन, कतर, कुवैत, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों के इलाकों में बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं, जिसमें दुबई और अबू दाबी के आवासीय और आर्थिक क्षेत्र भी शामिल हैं. फिर भी इन देशों की ओर से अभी तक ईरान के खिलाफ कोई व्यापक सैन्य पलटवार नहीं किया गया, जिसने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.
क्या है ईरान पर पलटवार न करने का कारण?
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद अधिकांश अरब देश चाहते हैं कि वे एक ऐसा संदेश न दें, जिसमें उन्हें 'ईरान और शिया दुनिया के खिलाफ' खड़ा दिखाया जाए. अगर वे ईरान पर सीधा हमला करते हैं, तो कई मुस्लिम दायरों में इसे अमेरिका–इजराइल के पक्ष में और 'इस्लाम के खिलाफ कदम' के रूप में पेश किया जा सकता है. इससे आंतरिक राजनीतिक दबाव भी बढ़ सकता है, खासकर जहां सोशल मीडिया और रिलिजियस नेटवर्क तेजी से राय बना रहे हों.
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अमेरिका के साथ सुरक्षा गठबंधन
दूसरी ओर, अरब देशों की आर्थिक रणनीति भी इस धीमेपन की वजह बनी हुई है. ये देश अमेरिका के साथ सुरक्षा गठबंधन पर निर्भर हैं, लेकिन साथ ही तेल बाजार, शिपिंग रूट और निवेश के लिहाज से वैश्विक शांति भी उनकी अहम जरूरत है. अगर वे ईरान पर हमला कर दें, तो तेहरान आर्थिक और सैन्य रूप से जवाब देने से नहीं चूकेगा, जिससे तनाव और विस्तार की गुंजाइश बढ़ सकती है. इसीलिए ज्यादातर अरब देशों ने अपनी रणनीति को कूटनीतिक दबाव तक सीमित रखा है.
जानकारों की मानें तो सऊदी अरब जैसे देशों की स्थिति खास है. वे दशकों से ईरान के साथ क्षेत्रीय प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा में रहे हैं, लेकिन अभी तक वे भी सीधे युद्ध की रेखा पार करने से बच रहे हैं. उनका रुख यह दिखाता है कि वे चाहते हैं कि तनाव कूटनीति और रणनीतिक रूप से कम हो, न कि धार्मिक भावनाओं और लोकप्रिय गुस्से के चलते अनियंत्रित हो जाए.