मिडिल ईस्ट में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी भीषण जंग ने पूरी दुनिया को डरा दिया है. इस महायुद्ध के बीच हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर दो बड़े मुस्लिम देश ईरान और सऊदी अरब एक-दूसरे के इतने कट्टर दुश्मन क्यों हैं और इसके पीछे की असली वजह क्या है. सऊदी अरब और ईरान के बीच चल रही दुश्मनी का सबसे बड़ा कारण धार्मिक और वैचारिक मतभेद है. ये दोनों ही पड़ोसी देश बेहद ताकतवर हैं और पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहते हैं. धार्मिक रूप से देखें तो ईरान एक शिया मुस्लिम बहुल राष्ट्र है जबकि सऊदी अरब खुद को सुन्नी मुस्लिम जगत की सबसे बड़ी शक्ति मानता है. यह धार्मिक दरार न केवल इन दोनों देशों के बीच है बल्कि खाड़ी के दूसरे मुल्कों में भी साफ दिखाई देती है. इन देशों के बीच चल रही सत्ता की होड़ ने पूरे क्षेत्र को दो गुटों में बांट दिया है जहां कुछ देश ईरान के साथ खड़े नजर आते हैं तो कुछ सऊदी अरब का समर्थन करते हैं.

1979 की क्रांति और बदलता इतिहास

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि सऊदी अरब हमेशा से खुद को मुस्लिम दुनिया का निर्विवाद नेता मानता रहा है. लेकिन साल 1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति ने सऊदी अरब के इस रूतबे को कड़ी चुनौती दी. इस क्रांति के बाद ईरान में एक नए तरह का धर्मतंत्र कायम हुआ जिसका लक्ष्य अपने प्रभाव को सीमाओं के पार तक फैलाना था. इसके बाद से ही दोनों देशों के बीच दूरियां बढ़ती चली गईं. साल 2003 में जब अमरीका ने इराक के शासक सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाया तो ईरान के लिए रास्ते और भी साफ हो गए क्योंकि सद्दाम हुसैन ईरान का कट्टर विरोधी था. उसकी मौत के बाद ईरान को अपनी ताकत बढ़ाने का सुनहरा मौका मिल गया.

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बढ़ता प्रभाव और तीसरे देशों में जंग

साल 2011 में जब अरब जगत के कई देशों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई और आंदोलन शुरू हुए तो इन दोनों देशों ने इसका पूरा फायदा उठाया. सऊदी अरब और ईरान ने सीरिया, बहरीन और यमन जैसे देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. आज ये दोनों देश सीधे युद्ध लड़ने के बजाय दूसरे देशों की जमीन पर एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं जिसे 'प्रॉक्सी वार' कहा जाता है. ईरान के आलोचकों का मानना है कि वह भूमध्य सागर तक अपना नियंत्रण हासिल करना चाहता है. वहीं सऊदी अरब को डर है कि अगर ईरान का प्रभाव इसी तरह बढ़ता रहा तो उसकी अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय साख खतरे में पड़ सकती है.

ताजा हालात और सुरक्षा की चुनौती

मौजूदा समय में मिडिल ईस्ट के हालात और भी ज्यादा गंभीर हो गए हैं. परमाणु कार्यक्रम से लेकर तेल की सप्लाई तक हर मुद्दे पर दोनों देश आमने-सामने हैं. सऊदी अरब और ईरान की इस दुश्मनी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों और सुरक्षा व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है. दुनिया भर की नजरें इन दोनों देशों पर टिकी हैं. अमरीका और अन्य पश्चिमी देश जहां सऊदी अरब के साथ खड़े दिखते हैं वहीं रूस और चीन जैसे देश ईरान के साथ अपने रिश्तों को मजबूत कर रहे हैं. इस टकराव ने न केवल अरब जगत बल्कि पूरी दुनिया की शांति को खतरे में डाल दिया है.