अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों में आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत बाद हो गई. इसके बाद ईरान ने अपने नए नेतृत्व का ऐलान कर दिया. ईरान के धार्मिक और सियासी नेतृत्व के बेहद भरोसेमंद चेहरा आयतुल्लाह अलीरेजा अराफी को देश का अंतरिम सर्वोच्च नेता बनाया गया है.
जब ईरान बाहरी युद्ध और आंतरिक अनिश्चितता के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है, अराफी के कंधों पर इस्लामिक गणराज्य को संभालने की बड़ी जिम्मेदारी है. सवाल ये है कि आखिर कौन हैं अलीरेजा अराफी और क्यों उन्हें इस पद के लिए चुना गया.
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कहां हुआ जन्म
अलीरेजा अराफी का जन्म साल 1959 में ईरान के यज्द प्रांत के मेयबोड में हुआ था. वह एक प्रतिष्ठित मौलवी परिवार से ताल्लुक रखते हैं. उनके पिता भी एक बड़े धार्मिक विद्वान थे. अराफी ने अपना अधिकांश जीवन ईरान के प्रमुख धार्मिक केंद्र कोम के मदरसों और प्रशासनिक संस्थानों में बिताया है.
'मुजतहिद' की पदवी और शिक्षा
अराफी ने कोम के शीर्ष विद्वानों के संरक्षण में शिक्षा प्राप्त की और 'मुजतहिद' का पद हासिल किया. शियाओं में यह एक ऊंची रैंक होती है, जो उन्हें स्वतंत्र रूप से इस्लामी कानूनी आदेश जारी करने का अधिकार देती है.
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खामेनेई के 'राइट हैंड'
अराफी का राजनीतिक ग्राफ खामेनेई के संरक्षण में तेजी से बढ़ा. खामेनेई ने उन्हें कई महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया था. उन्होंने पहले मेयबोड और बाद में कोम में जुमे की नमाज पढ़ाई, जो सत्ता के करीब होने का बड़ा संकेत माना जाता है. अल-मुस्तफा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के चेयरमैन भी रहे हैं, यह जो ईरान और विदेशों के मौलवियों को ट्रेनिंग देता है. साल 2019 में खामेनेई ने उन्हें शक्तिशाली 'गार्जियन काउंसिल' का सदस्य बनाया, जो कानूनों की समीक्षा करती है.
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अराफी ही क्यों?
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (CFR) के अनुसार, अराफी के पास प्रशासनिक अनुभव और धार्मिक ज्ञान का सटीक मेल है. वह कट्टरपंथी खेमे के माने जाते हैं और व्यवस्था के प्रति बेहद वफादार हैं. इसके अलावा वे खामेनेई के खास रहे और सियासी नेतृत्व में भी उनकी पकड़ अच्छी है.