पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में रविवार को एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसमें तुर्किये, मिस्र और सऊदी अरब के प्रतिनिधि शामिल हुए. इस वार्ता का मुख्य उद्देश्य ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव को कम करना और दुनिया के सबसे जरूरी समुद्री रास्ते ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को व्यापार के लिए फिर से खुलवाना है. पाकिस्तान इस पूरे मामले में एक मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है ताकि खाड़ी क्षेत्र में जारी युद्ध को रोका जा सके. बैठक के पहले दिन के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने बताया कि सभी क्षेत्रीय शक्तियां युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त करने के लिए गंभीर हैं और चीन ने भी इस शांति पहल का पूरा समर्थन किया है.
अमेरिका को भेजे गए खास प्रस्ताव
सूत्रों के हवाले से खबर है कि बैठक में शामिल देशों ने समुद्री यातायात को सुचारू बनाने के लिए अमेरिका को कुछ ठोस प्रस्ताव भेजे हैं. इसमें स्वेज नहर की तर्ज पर एक शुल्क ढांचा तैयार करने की बात कही गई है ताकि जहाजों की आवाजाही को व्यवस्थित किया जा सके. ऐसी चर्चा है कि तुर्किये, मिस्र और सऊदी अरब मिलकर एक खास संघ या कंसोर्टियम बना सकते हैं जो इस जलमार्ग से होने वाले तेल के प्रवाह की निगरानी करेगा. हालांकि पाकिस्तान ने इस संघ में औपचारिक रूप से शामिल होने से फिलहाल इनकार किया है लेकिन वह पर्दे के पीछे से बातचीत जारी रखने में मदद कर रहा है.
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तुर्किये की प्राथमिकता और ईरान का नरम रुख
तुर्किये के राजनयिक सूत्रों का कहना है कि उनकी पहली प्राथमिकता इलाके में जल्द से जल्द युद्धविराम लागू करवाना है. तुर्किये का मानना है कि अगर जहाजों को सुरक्षित रास्ता मिल जाता है तो इससे दोनों पक्षों के बीच भरोसा बढ़ेगा और बातचीत की राह आसान होगी. इस बीच एक राहत भरी खबर यह आई है कि ईरान ने पाकिस्तान के झंडे वाले 20 और जहाजों को होर्मुज के रास्ते गुजरने की अनुमति दे दी है. इशाक डार ने खुद सोशल मीडिया पर इस जानकारी को साझा करते हुए इसे एक बड़ी कामयाबी बताया है जिससे तेल संकट के बीच वैश्विक बाजार को थोड़ी राहत मिल सकती है.
अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत की चुनौती
हैरानी की बात यह है कि इस पूरी बैठक में मुख्य पक्ष यानी अमेरिका, ईरान और इजरायल का कोई भी प्रतिनिधि मौजूद नहीं था. मिस्र के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि इन बैठकों का असली मकसद अमेरिका और ईरान को एक मेज पर लाना है ताकि वे सीधे संवाद कर सकें. हालांकि अभी भी दोनों देशों के बीच की दूरी कम होती नहीं दिख रही है क्योंकि अमेरिकी अधिकारियों ने युद्ध को निर्णायक मोड़ पर बताया है तो वहीं ईरानी नेता सार्वजनिक रूप से बातचीत की संभावना को नकार रहे हैं. अब देखना यह होगा कि मुस्लिम देशों की यह एकजुट कोशिश दुनिया को इस बड़े तेल संकट और संभावित महायुद्ध से बचा पाती है या नहीं.
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