इस्लाम में ब्याज (रिबा) लेना और देना हराम माना जाता है. इसके बावजूद कई मुस्लिम बहुल देशों में बैंकिंग सिस्टम इस्लामिक बैंकिंग के जरिए काम करता है. ये एक ऐसा फाइनेंशियल मॉडल है, जो ब्याज के बजाय व्यापार, संपत्ति के मालिकाना हक और मुनाफे के बंटवारे पर बेस्ड होता है. कई देशों में पारंपरिक बैंक और इस्लामिक बैंक दोनों साथ-साथ काम करते हैं, जबकि कुछ देशों में सिर्फ शरिया आधारित बैंकिंग व्यवस्था अपनाई जाती है. पारंपरिक बैंकिंग के विपरीत इस्लामिक बैंकिंग में लोन पर ब्याज नहीं लिया जाता. इसके बजाय बैंक व्यापार, निवेश, लीजिंग और साझेदारी के जरिए कमाई करते हैं. इस व्यवस्था में बैंक और ग्राहक दोनों मुनाफा और जोखिम साझा करते हैं.
ये भी पढ़ें: मंदिरों में करोड़ों का चढ़ावा, मस्जिदों में कम दान क्यों? जानिए कौन-सी है सबसे अमीर मस्जिद
क्या है मुराबहा (Murabaha)?
मुराबहा इस्लामिक बैंकिंग का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला मॉडल है. इसे कॉस्ट प्लस प्रॉफिट मॉडल भी कहा जाता है. अगर कोई ग्राहक घर, गाड़ी या बाकी संपत्ति खरीदना चाहता है, तो बैंक उसे सीधे नकद पैसा नहीं देता. बैंक पहले खुद उस संपत्ति को खरीदता है और फिर उसे अपने तय मुनाफे के साथ ग्राहक को बेचता है. ग्राहक इस राशि का भुगतान किस्तों में करता है. इस तरह बैंक की कमाई ब्याज से नहीं, बल्कि व्यापार से होने वाले मुनाफे से होती है.
क्या है मुदारबाह (Mudarabah)?
मुदारबाह मॉडल में बैंक निवेश के लिए पूंजी मुहैया कराता है, जबकि ग्राहक अपनी विशेषज्ञता और मेहनत से कारोबार चलाता है. अगर कारोबार में मुनाफा होता है तो पहले से तय अनुपात के मुताबिक, बैंक और ग्राहक के बीच उसका बंटवारा किया जाता है. वहीं अगर वित्तीय नुकसान होता है तो उसका भार पूंजी मुहैया कराने वाला पक्ष उठाता है.
क्या है मुशारका (Musharakah)?
मुशारका में बैंक और ग्राहक दोनों किसी बिजनेस या प्रोजेक्ट में पूंजी लगाते हैं. दोनों पक्ष निवेश करते हैं, इसलिए जोखिम भी साझा करते हैं. मुनाफे का बंटवारा आपसी सहमति से तय अनुपात में किया जाता है, जबकि नुकसान हर पक्ष के निवेश के अनुपात में बांटा जाता है.
इजारा (Ijarah) में लीजिंग से होती है कमाई
इजारा मॉडल लीजिंग व्यवस्था की तरह काम करता है. इसमें बैंक मशीनरी, वाहन, ऑफिस या एयरक्राफ्ट जैसी संपत्ति खरीदता है और उसे तय अवधि के लिए ग्राहक को लीज पर देता है. ग्राहक बैंक को किराया देता है और यही किराये की आय बैंक की कमाई का जरिया बनती है. इसमें ब्याज नहीं लिया जाता.
क्या है सुकुक (Sukuk)?
सुकुक का इस्लामिक फाइनेंस में व्यापक इस्तेमाल होता है. इन्हें अक्सर इस्लामिक बॉन्ड कहा जाता है.हालांकि सामान्य बॉन्ड की तरह इनमें निश्चित ब्याज नहीं मिलता. सुकुक किसी वास्तविक संपत्ति में मालिकाना हक का प्रतिनिधित्व करते हैं. निवेशकों को ब्याज के बजाय उस संपत्ति से होने वाले मुनाफे या किराये की आय से रिटर्न मिलता है.
ये भी पढ़ें: अजान पर इस देश में लगेगा प्रतिबंध? इमिग्रेशन मिनिस्टर ने दिया बड़ा बयान, कहा- इस्लामाबाद जैसा माहौल नहीं बनेंगे देंगे
संबंधित खबरें
अल नीनो के बाद डरा रहा है ला नीना! क्या ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे को बढ़ाएगा
6 hrs agoब्राजील के डिजिटल जनरल: आंद्रे जानोनेस और लूला की जीत
10 hrs agoसीक्रेट प्लान का शिकार हुईं शेख हसीना! बांग्लादेश में तख्तापलट पर खुलासा
10 hrs agoVIDEO : सड़क पर उतरी भीड़, नेतन्याहू के घर को घेरा; विपक्ष से की ये मांग
18 hrs agoईरान-यूक्रेन की टॉप सीक्रेट की थी लीक... बर्खास्त US जनरल का कबूलनामा
19 hrs agoइजरायल में वोटों की गिनती पूरी, 'बीबी' को बहुमत नहीं; अरब दल बने 'किंगमेकर'
21 hrs agoपाकिस्तान में बड़ा हादसा, एंबुलेंस में फटा ऑक्सीजन सिलेंडर; 10 लोगों की मौत
1 day agoइजरायल चुनाव में धांधली की जांच तेज, क्या नेतन्याहू बनाएंगे यूनिटी सरकार?
1 day agoयूक्रेन की ट्रेन पर रूस का ड्रोन हमला, 13 की मौत, प्लेटफॉर्म पर अफरा-तफरी
1 day agoसंकट में हैं 350000 जिंदगियां, सुपर अल नीनो से दुनिया में पड़ेगी भीषण गर्मी
1 day agoन्यूज 24 पर पढ़ें देश, राष्ट्रीय समाचार (National News), खेल, मनोरंजन, धर्म, लाइफ़स्टाइल, हेल्थ, शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और लेटेस्ट अपडेट के लिए News 24 App डाउनलोड कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।
First published on:
Know More: Editorial Guidelines