मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध के बीच एक ऐसा सनसनीखेज खुलासा हुआ है, जिसने अमेरिकी सेना में हड़कंप मचा दिया है. न्यूयॉर्क टाइम्स और फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरानी हैकर्स ने मिडिल ईस्ट के पुराने कम्युनिकेशन सिस्टम की एक बड़ी कमजोरी का फायदा उठाकर वहां तैनात अमेरिकी सैनिकों और सुरक्षा ठेकेदारों के मोबाइल फोन की लाइव लोकेशन ट्रैक कर ली. इस जासूसी की मदद से ईरान ने अमेरिकी ठिकानों पर बेहद सटीक मिसाइल और आत्मघाती ड्रोन हमले किए, जिससे युद्ध के शुरुआती चरण में ईरान को अभूतपूर्व बढ़त हासिल हुई.

कैसे अमेरिकी सेना तक पहुंचे हैकर्स?

ग्लोबल मोबाइल जासूसी पर नजर रखने वाली संस्था 'मोबाइल सर्विलांस मॉनिटर' ने अपनी जांच में पाया कि कई मध्य-पूर्वी देशों के टेलीकॉम नेटवर्कों पर अचानक ऐसे डिजिटल रिक्वेस्ट की बाढ़ आ गई, जो घरेलू नेटवर्क से बाहर रोमिंग पर चल रहे फोन की सटीक लोकेशन पिन करते हैं. ईरानी हैकर्स ने इसके लिए SS7 प्रोटोकॉल की कमियों का इस्तेमाल किया. यह एक ऐसा पुराना इंटरनेशनल टेलीकॉम प्रोटोकॉल है जो दुनिया भर के मोबाइल नेटवर्कों को आपस में जोड़ने और रोमिंग को सुचारू बनाने का काम करता है.

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फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान और उसके सहयोगियों ने स्थानीय मोबाइल ऑपरेटरों के रोमिंग डील में सेंध लगाई और अमेरिकी सैन्य कर्मियों के फोन सिग्नल के जरिए उनके ठिकानों का पता लगा लिया.

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बेस छोड़ होटलों में भागे, वहां भी गिरे बम

इस साइबर वॉरफेयर क्षमता की बदौलत ईरान के पास अमेरिकी सैनिकों की रियलटाइम में तुरंत और लगातार लोकेशन जानने की शक्ति आ गई. इसका असर यह हुआ कि इराक और बहरीन सहित पूरे मध्य पूर्व में स्थित अमेरिकी ठिकाने ईरानी मिसाइलों की सीधी जद में आ गए. इराक और बहरीन में अमेरिकी नौसेना का बेहद संवेदनशील पांचवां बेड़ा तैनात है.

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रिपोर्ट में दावा किया गया है कि स्थिति इतनी भयावह हो गई थी कि ईरानी हमलों से बचने के लिए जो अमेरिकी फौजी अपने मुख्य सैन्य बेस को छोड़कर स्थानीय होटलों में शिफ्ट हुए थे, हैकर्स ने उन्हें वहां भी ट्रैक कर लिया और उन होटलों को भी निशाना बनाया गया. इसके अलावा, अमेरिकी सेना को रसद और साजो-सामान सप्लाई करने वाले ठेकेदारों को भी चुन-चुनकर निशाना बनाया गया.