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जंग में इन 5 देशों ने अमेरिका से किया किनारा, ईरान के खिलाफ क्यों नहीं दिया US का साथ?

ईरान के साथ जंग में अमेरिका अकेला पड़ता दिख रहा है. फ्रांस, तुर्की और सऊदी अरब समेत 5 देशों ने ट्रंप का साथ देने और सैन्य गठबंधन में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है.

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ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका को अपने सबसे भरोसेमंद यूरोपीय सहयोगियों से तगड़ा झटका लगा है. फ्रांस ने पूरी दुनिया के सामने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी सेना को अमेरिकी कमान के नीचे नहीं रखेगा. पेरिस का मानना है कि सैन्य कार्रवाई के बजाय क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए कूटनीति का सहारा लेना चाहिए. वहीं इटली ने भी लाल सागर मिशन में शामिल होने से इनकार कर दिया है. रोम की सरकार ने साफ कहा है कि वह केवल रक्षात्मक कार्रवाई का समर्थन करती है और युद्ध की आग को भड़काने के पक्ष में नहीं है. स्पेन ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए अमेरिकी नेतृत्व वाले किसी भी एकतरफा सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से मना कर दिया है.

नाटो और खाड़ी देशों का बदला रुख

अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय तुर्की और सऊदी अरब का फैसला है. नाटो का अहम सदस्य होने के बावजूद तुर्की ने खुलकर अमेरिका की युद्ध नीतियों की आलोचना की है. तुर्की ने इस पूरे संघर्ष में खुद को तटस्थ रखने का फैसला किया है जिससे नाटो की एकजुटता पर सवाल खड़े हो रहे हैं. दूसरी तरफ सऊदी अरब ने भी सबको चौंका दिया है. दशकों पुराना सहयोगी होने के बावजूद सऊदी अरब ने इस बार अपनी सीमाओं की सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति वार्ता को युद्ध से ऊपर रखा है. सऊदी अरब का यह फैसला अमेरिका की मिडिल ईस्ट रणनीति के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है क्योंकि उसे इस क्षेत्र में रियाद के समर्थन की सबसे ज्यादा उम्मीद थी.

यह भी पढ़ें: ईरान को मिटाने का खौफनाक प्लान! व्हाइट हाउस में क्यों हुई ट्रंप की इमरजेंसी मीटिंग?

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कूटनीतिक समाधान और संप्रभुता की प्राथमिकता

युद्ध से पीछे हटने वाले इन सभी देशों का तर्क है कि हथियारों के बजाय कूटनीति से मसले हल किए जाने चाहिए. फ्रांस और इटली जैसे देश अपनी सैन्य संप्रभुता को लेकर काफी सचेत नजर आ रहे हैं और वे नहीं चाहते कि किसी दूसरे देश के इशारे पर उनके सैनिक युद्ध की आग में झोंके जाएं. स्पेन ने भी यह स्पष्ट किया है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र की सहमति के बिना कोई भी सैन्य कदम उठाना गलत होगा. इन देशों का मानना है कि अमेरिका की आक्रामक नीतियां वैश्विक अर्थव्यवस्था और समुद्री व्यापार के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं जिससे आने वाले समय में पूरी दुनिया को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.

अमेरिकी गठबंधन में बढ़ती दरार और चुनौतियां

इन महत्वपूर्ण देशों के इनकार के बाद अब अमेरिका के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है. बिना फ्रांस, तुर्की और सऊदी अरब जैसे देशों के सहयोग के अमेरिका के लिए ईरान पर दबाव बनाना और समुद्री रास्तों को सुरक्षित रखना मुश्किल होगा. यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका की गिरती साख और उसके नेतृत्व पर उठते सवालों को दर्शाती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर और भी देश इसी तरह पीछे हटते रहे तो अमेरिका मिडिल ईस्ट में पूरी तरह अकेला पड़ सकता है. अब देखना यह होगा कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप इन देशों को मनाने में कामयाब होते हैं या फिर अमेरिका को इस महायुद्ध में अकेले ही अपनी ताकत झोंकनी पड़ेगी.

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लेखक के बारे में

Raja Alam

राजा आलम वर्तमान में News 24 हिंदी (B.A.G. Network) में सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. हिंदी पत्रकारिता में चार वर्षों के अनुभव के साथ नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर बारीकी से लेखन कर रहे हैं. पत्रकारिता की नींव देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU), अलीगढ़ से रखी, जहां से राजा आलम ने पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद, हिंदी लेखन में गहराई को और विस्तार दिया जब राजा ने जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से हिंदी साहित्य में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की. हर रोज़ कुछ नया सीखना और पाठकों तक सही, निष्पक्ष और भरोसेमंद खबर पहुंचाना उनका मुख्य उद्देश्य रहा है. राजा के लेखन में आपको पत्रकारिता की गंभीरता के साथ-साथ पाठकों से जुड़ने वाली सरल भाषा और कंटेंट की विविधता दोनों मिलेंगे.
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