भारतीय सेना की एंटी-टैंक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में भारत ने अमेरिका से जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम खरीदने का समझौता किया है. अमेरिकी दूतावास ने इस डील की पुष्टि की है. यह डील ऐसे समय हुई है जब भारतीय सेना अपनी युद्धक क्षमताओं को आधुनिक बनाने और अपनी सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए हथियारों की खरीद कर रही है.
जैवलिन मिसाइल की खासियत क्या है?
जैवलिन को दुनिया की चर्चित पोर्टेबल एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियों में गिना जाता है. इसे सैनिक कंधे से लॉन्च कर सकते हैं और इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से टैंक और अन्य बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है. इसकी सबसे अहम विशेषता ‘फायर एंड फॉरगेट’ तकनीक है. लक्ष्य को लॉक करने के बाद मिसाइल को लगातार ऑपरेटर की ओर से गाइड करने की जरूरत नहीं पड़ती है. इस हथियार की एक और खासियत इसका टॉप-अटैक ऑप्शन है. इसमें मिसाइल लक्ष्य के ऊपरी हिस्से पर हमला कर सकती है, जहां आम तौर पर टैंक का कवच अपेक्षाकृत कमजोर होता है. जैवलिन में टैंडम वारहेड का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे आधुनिक बख्तरबंद सुरक्षा को भेदने के लिए डिजाइन किया गया है.
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जैवलिन मिसाइल की कीमत कितनी है?
जैवलिन मिसाइल की कीमत की बात करें तो जैवलिन मिसाइल की कीमत केवल एक तय रकम नहीं है. इसकी लागत इस बात पर निर्भर करती है कि खरीद में सिर्फ मिसाइल शामिल है या पूरा जैवलिन हथियार सिस्टम. अमेरिकी सेना के बजट से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, एक जैवलिन मिसाइल की औसत बेस कीमत करीब 1,07,500 डॉलर, यानी लगभग 90 लाख रुपये बैठती है. वहीं, पुराने मॉडल की कीमत करीब 80 हजार डॉलर, यानी लगभग 67 लाख रुपये प्रति मिसाइल बताई जाती रही है.
हालांकि, किसी रक्षा सौदे की कुल रकम सिर्फ मिसाइलों की कीमत से तय नहीं होती. जैवलिन सिस्टम के साथ कई दूसरे उपकरण और सेवाएं भी खरीद का हिस्सा हो सकती हैं. इनमें दोबारा इस्तेमाल की जाने वाली कमांड लॉन्च यूनिट, प्रशिक्षण से जुड़े उपकरण, सिम्युलेटर, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता शामिल हैं.
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जैवलिन मिसाइल क्या है और कैसे काम करती है?
जैवलिन एक मीडियम रेंज की एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल है, जिसे खास तौर पर दुश्मन के टैंक और दूसरे बख्तरबंद ठिकानों को निशाना बनाने के लिए विकसित किया गया है. इसे अमेरिकी कंपनियां रेथियॉन और लॉकहीड मार्टिन मिलकर तैयार करती हैं. अमेरिकी सेना और मरीन कॉर्प्स के अलावा दुनिया के कई देशों की सेनाएं भी इस मिसाइल का इस्तेमाल करती हैं. जैवलिन की प्रभावी मारक क्षमता करीब 2.5 किलोमीटर तक बताई जाती है. हालांकि इसकी वास्तविक रेंज मिसाइल के वर्जन और युद्ध के हालात पर निर्भर कर सकती है. इसका इस्तेमाल टैंकों, बख्तरबंद वाहनों और मजबूत सैन्य ठिकानों के खिलाफ किया जा सकता है.
इस मिसाइल की सबसे अहम विशेषता इसकी ‘फायर एंड फॉरगेट’ तकनीक है. इसका मतलब है कि सैनिक लक्ष्य को लॉक करने के बाद मिसाइल दाग सकता है और उसके बाद उसे लगातार नियंत्रित करने की जरूरत नहीं होती. लॉन्च के बाद मिसाइल खुद लक्ष्य की ओर बढ़ती है. इससे सैनिक को उसी जगह पर रुककर मिसाइल को निर्देश देने की जरूरत नहीं होती और वह तुरंत सुरक्षित स्थान पर जा सकता है.
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जैवलिन को सैनिक कंधे से भी लॉन्च कर सकते हैं और जरूरत के मुताबिक इसे ट्राइपॉड पर भी लगाया जा सकता है. इसकी यही पोर्टेबिलिटी और संचालन में आसानी इसे अलग-अलग युद्ध परिस्थितियों में उपयोगी बनाती है. खासकर ऐसी परिस्थतियों में जहां सैनिकों को दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों पर तेजी से हमले करने होते हैं.
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भारत ने अमेरिका के साथ कितने में की डील?
अमेरिकी सरकार की ओर से पहले मंजूर किए गए संभावित पैकेज की अनुमानित लागत 45.7 मिलियन डॉलर, यानी करीब 400 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई थी. इस पैकेज में सिर्फ मिसाइलें ही नहीं, बल्कि लॉन्च यूनिट, प्रशिक्षण, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सहायता और अन्य लॉजिस्टिक सुविधाएं भी शामिल थीं. अमेरिकी दस्तावेज के मुताबिक प्रस्ताव में 100 FGM-148 Javelin rounds, एक अतिरिक्त fly-to-buy missile और 25 Lightweight Command Launch Units शामिल थे. हालांकि, मौजूदा डील को लेकर सार्वजनिक रूप से अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं. कुछ रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने करीब 292 करोड़ रुपये की लागत से जैवलिन मिसाइलों की खरीद की है.
भारत के लिए क्यों अहम है यह सौदा?
जैवलिन की खरीद से भारतीय सेना को पैदल सैनिकों के स्तर पर दुश्मन के टैंकों और बख्तरबंद वाहनों से निपटने के लिए एक आधुनिक विकल्प मिलेगा. साथ ही, अमेरिका ने संकेत दिया है कि यह सौदा भविष्य में भारत में जैवलिन के सह-उत्पादन की संभावनाओं का रास्ता भी खोल सकता है. इससे यह समझौता केवल तत्काल सैन्य जरूरत तक सीमित न रहकर भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग के अगले चरण की शुरुआत भी बन सकता है.
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