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क्या है 132 साल पुरानी डुरंड लाइन? जो पाकिस्तान-अफगानिस्तान में जंग की बड़ी वजह

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच 132 साल पुरानी फैली डुरंड लाइन न केवल दो देशों को अलग करती है, बल्कि पश्तून समुदाय को दो भागों में बांटती है, अफगानिस्तान ने इसे कभी अपना नहीं माना. अफगानिस्तान की ओर से इस पर हमले की खबरों ने डुरंड लाइन को फिर सुर्खियों में ला दिया है. जानें इसके बारे में

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पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच डूरंड लाइन पर भारी झड़पें और हवाई हमले हो रहे हैं. पाकिस्तान ने ‘ओपन वॉर’ की घोषणा कर दी है, जबकि अफगान तालिबान ने जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जे का दावा किया है. इन्हीं हमलों से चर्चा में आई 132 साल पुरानी लगभग 2,600 किलोमीटर लंबी डुरंड लाइन, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा निर्धारित करती है. यह 12 नवंबर 1893 को ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर हेनरी मोर्टिमर डूरंड और अफगानिस्तान के अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच समझौते से खींची गई थी.

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क्या है डूरंड लाइन का मकसद?

डूरंड लाइन ‘ग्रेट गेम’ का हिस्सा था, जहां ब्रिटेन रूस के प्रभाव को रोकने के लिए अफगानिस्तान को बफर जोन बनाना चाहता था. अमीर अब्दुर रहमान ने शुरुआत में कहा था. ‘यह पहली बार है कि अफगानिस्तान की स्पष्ट सीमा निर्धारित की गई है, जिससे भविष्य में गलतफहमी पैदा नहीं होगी’ लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता ब्रिटिश दबाव में हुआ, जिसमें अफगानिस्तान ने बड़े इलाकों पर अपना दावा छोड़ दिया. 1947 में भारत के बंटवारे के बाद यह लाइन पाकिस्तान अफगानिस्तान की सीमा बन गई. पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है और 2017 में कांटेदार तार लगाए.

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अफगानिस्तान ने कभी नहीं दी मान्यता

अफगानिस्तान ने कभी इसे पूरी तरह मान्यता नहीं दी, क्योंकि यह पश्तून और बलूच कबीलों को दो हिस्सों में बांटती है. एक तरफ अफगानिस्तान, दूसरी तरफ पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान. अफगानों का कहना है कि यह समझौता ब्रिटिश दबाव में हुआ और जबरन थोपा गया. डुरंड लाइन पश्चिम में ईरान की सीमा से शुरू होकर पूर्व में चीन की सीमा तक फैली हुई है. यह रेखा पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तानों और दुर्गम क्षेत्रों से गुजरती है, जिसकी वजह से इसकी निगरानी हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है.

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लेखक के बारे में

Vijay Jain

विजय कुमार न्यूज 24 में बतौर सीनियर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं. विजय कुमार ने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत प्रिंट मीडिया के साथ की. अपने 23 साल के करियर में वह दैनिक जागरण, अमर उजाला और दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों के साथ जुड़े रहे हैं. विजय कुमार राजनीति, चुनाव, क्राइम और करंट अफेयर्स जैसे विषयों पर तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. विजय कुमार ने दैनिक भास्कर में रिपोर्टिंग के दौरान स्टिंग ऑपरेशन भी किए. 23 साल के अनुभव के दौरान विजय कुमार ने करियर के शुरुआती दौर में डेस्क जर्नलिस्ट रहते हुए की. विजय कुमार को 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के अलावा बिहार, यूपी, बंगाल, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के विधानसभा चुनाव की ग्राउंड कवरेज का अनुभव है. ग्रामीण उद्योगीकरण में स्नातक की डिग्री होने के कारण विजय कुमार को ग्रामीण इलाकों की समस्याओं और उनसे जुड़ी कवरेज का खासा अनुभव है. अपने लेख के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण इलाकों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया है. पत्रकारिता में अनुभव: 23 साल योग्यता, डिग्री / अन्य उपलब्धियां: शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से ग्रामीण उद्योगीकरण विषय में बीए की डिग्री प्राप्त की है. विजय कुमार को पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2017 में 'श्रीफल जर्नलिज्म नेशनल अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया.
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