अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम तो बढ़ गया, लेकिन ट्रंप 'नौसैनिक नाकेबंदी' से पीछे नहीं हटा है. इसके पीछे अमेरिका ने एक बड़ी चाल चलने की साजिश रची है. अमेरिका का 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' अब 'इकोनॉमिक फ्यूरी' में बदल चुका है, जिसका सीधा मकसद ईरान की लाइफलाइन यानी उसके ऑयल रेवेन्यू को पूरी तरह तबाह कर देना.

खार्ग आइलैंड- अमेरिका का नया 'टारगेट'

अमेरिका की रणनीति साफ कि होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी जारी रखकर ईरान के ऑयल एक्सपोर्ट को शून्य पर लाना. ईरान का मुख्य तेल हब 'खार्ग आइलैंड' अब संकट में है. अगर ईरान तेल निर्यात नहीं कर पाएगा, तो उसके स्टोरेज टैंक कुछ ही दिनों में भर जाएंगे. ऐसी स्थिति में ईरान को अपने तेल के कुएं बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जो उसकी इकॉनमी के लिए बड़ा खतरनाक साबित होगा.

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US ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है, 'कुछ ही दिनों में, खार्ग आइलैंड का स्टोरेज भर जाएगा, और ईरान के तेल के कुएं बंद हो जाएंगे. ईरान के समुद्री व्यापार पर रोक लगाने से सीधे तौर पर सरकार की मुख्य रेवेन्यू लाइफलाइन पर असर पड़ेगा.'

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न बमबारी, न शोर… सिर्फ आर्थिक चोट

ट्रंप इस बात को बखूबी जानते हैं कि एक महीने की बमबारी और धमकियों के बावजूद ईरान का रुख नरम नहीं पड़ा. इसीलिए अब 'आर्थिक हथियार' का इस्तेमाल किया जा रहा है. ट्रंप का कहना है कि ईरानी शासन के भीतर दरारें हैं. रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के भीतर चल रही खींचतान का फायदा अमेरिका उठाना चाहता है. नाकेबंदी के जरिए ईरान के राजस्व को चोट पहुंचाकर अमेरिका वहां के नेतृत्व को कमजोर करना चाहता है.

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20% ग्लोबल तेल दांव पर

होर्मुज स्ट्रेट, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है, वहां तनाव चरम पर है. पिछले एक हफ्ते में अमेरिकी नौसेना ने 27 जहाजों को वापस भेज दिया है और दो ईरानी मालवाहक जहाजों को अपने कब्जे में ले लिया है. अमेरिका ने चेतावनी दी है कि जो भी देश या जहाज चोरी-छिपे ईरान की मदद करेगा, उसे कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा.

इस घेराबंदी का असर कितना हो रहा है, इसका अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि ईरान ने किसी भी नए दौर की बातचीत से पहले ब्लॉकेड हटाने की मांग की थी.