US Operation Sapphire Explainer: अमेरिकी सेना और राष्ट्रपति ट्रंप की प्लानिंग ईरान के 440 किलो संवर्धित यूरेनियम को जब्त करने की है। इसके लिए अमेरिका के 21 युद्धपोत, 50000 सैनिक और 3500 मरीन कमांडो ईरान में जमीनी हमला करने के लिए तैयार हैं। लेकिन एक्सपर्ट कहते हैं कि अमेरिका के लिए ईरान के यूरेनियम तक पहुंचना और उसे जब्त करना आसान नहीं होगा। जबकि अमेरिका आज से 22 साल पहले ऐसे ही एक मिशन को अंजाम देकर 600 किलो यूरेनियम जब्त कर चुका है। जी हां, उस मिशन का नाम ऑपरेशन सफायर था, जो कजाकिस्तान में अंजाम दिया गया था।

क्या था अमेरिकी सेना का प्रोजेक्ट सफायर?

ऑपरेशन सफायर के तहत 1990 में यूनियन ऑफ सावियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स (USSR) का विघटन हुआ था, तब कजाकिस्तान आजाद देश बना था। जब विघटन हुआ था तो अलग-अलग इलाकों में स्टोर संवर्धित यूरेनियम भी बंट गया था। ऐसे ही करीब 600 किलो हाईली एनरिच्ड यूरेनियम (HEU) कजाकिस्तान के हिस्से में आया था। क्योंकि उस समय कजाकिस्तान में आतंकियों, तस्करों और हथियार माफिया का बोलबाला था। अमेरिका को डर था कि अगर यूरेनियम इन अराजक तत्वों के हाथ लग गया तो वे विनाशकारी साबित हो सकते थे, क्योंकि 600 किलो यूरेनियम से 10 एटम बम बनाए जा सकते थे।

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बिल क्लिंटन ने ऑपरेशन का फैसला किया था

बता दें कि सफायर ऑपरेशन को बिल क्लिंटन ने मंजूरी दी थी। उनके नेतृत्व में ही ऑपरेशन पूरा किया गया था। कजाकिस्तान के उस्त-कामेनोगोर्स्क शहर के पास उल्बा मेटलर्जिकल प्लांट के एक पुराने वेयरहाउस में 600 किलोग्राम हाईली एनरिच्ड यूरेनियम (HEU) था, जो अल्फा क्लास पनडुब्बी बनाने के लिए था। लेकिन इसके गलत हाथों में जाने का डर था। कजाकिस्तान में अमेरिकन एम्बेसी के अधिकारी एंडी वेबर को इस यूरेनियम के बारे में पता चला तो उन्होंने उस समय के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को बताया। बिल क्लिंटन ने कजाकिस्तान की भलाई के लिए उस यूरेनियम को जब्त करने का फैसला किया।

ऑपरेशन सफायर कैसे अंजाम दिया गया था?

अमेरिका और कजाकिस्तान के बीच महीनों यूरेनियम जब्त करने की डिप्लोमेसी पर काम हुआ। एक समझौते के तहत सीक्रेट ऑपरेशन चलाने के लिए प्लान बनाया गया। बिल क्लिंटन ने 7 अक्टूबर 1994 को एक सीक्रेट ऑर्डर पर साइन किए और ऑपरेशन को सफायर कोडनेम दिया। अक्टूबर में ही डेलावेयर के डोवर एयर फोर्स बेस से 3 विशालकाय C-5 Galaxy कार्गो विमानों ने उड़ान भरी। तीनों विमानों में 31 एक्सपर्ट की टीम थी, जिसमें सिविल टेक्निशियन, पेंटागन और एनर्जी डिपार्टमेंट के एक्सपर्ट थे। एक डॉक्टर भी था, जो रेडिएशन से उनका बचाव करता और क्योंकि यूरेनियन में जहरीला बेरिलियम था।

उस्त-कामेनोगोर्स्क पहुंचकर सभी 31 लोगों ने 4 हफ्ते तक हर रोज 12 घंटे काम किया। भरी ठंड और बर्फबारी के बीच 4 हफ्ते ऐसे काम किया गया कि 31 लोग किसी को नजर तक नहीं आए। रेडिएशन के खतरे के बावजूद सभी ने 600 किलोग्राम यूरेनियम और 2200 किलोग्राम अन्य मैटेरियल को 400 से ज्यादा शिपिंग कंटेनरों में पैक किया। रात के 3 बजे सभी केंटनर ट्रक में लादकर एयरपोर्ट लाएग थे। बर्फीली सड़कों पर फिसल रहे ट्रकों को किसी तरह कजाक सेना और कमांडो की मदद से एयरपोर्ट पहुंचाया गया। C-5 गैलेक्सी विमानों में कंटेनरों को लोड किया। कंटेनरों को विमान में लादने में एक दिन लगा।

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फिर विमान बिना रुके अमेरिका के डोवर एयर फोर्स बेस पहुंचा। यहां से कंटेनरों को ट्रकों में लादकर टेनेसी के ओक रिज में बने नेशनल सिक्योरिटी कॉम्प्लेक्स लाया गया। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एसोसिएशन (IAEA) की निगरानी में हाई एनरिच्ड यूरेनियम को लो एनरिच्ड यूरेनियम बनाया गया, जिसका इस्तेमाल भविष्य में अलग-अलग निर्माण कार्यों में किया गया। ऑपरेशन पूरा होने के बाद 23 नवंबर 1994 को बिल क्लिंटन ने पूरी दुनिया को ऑपरेशन के बारे में बताया। इस तरह अमेरिका ने न सिर्फ परमाणु प्रसार को रोका, बल्कि कजाकिस्तान के बीच बेहद मजबूत और लंबे रणनीतिक रिश्ते भी स्थापित किए।

कजाकिस्तान-ईरान के हालात अलग-अलग कैसे?

यूरेनियम जब्त करने में कजाकिस्तान ने अमेरिका को पूरा और हरसंभव सहयोग दिया था। कजाकिस्तान की सहमति से ही यूरेनियम जब्त किया गया था, लेकिन ईरान तो विरोधी है और अमेरिका को अपना यूरेनियम देना नहीं चाहता। अगर अमेरिका ने जबरदस्ती की तो ईरान सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार है। कजाकिस्तान में अमेरिका का ऑपरेशन सीक्रेट था और नॉन कॉम्बैट था। ईरान में अमेरिका ने ऑपरेशन चलाया तो पूरी दुनिया को पता होगा और हाइली कॉम्बैट ऑपरेशन रहेगा।

ईरान का मैटेरियल UF6 गैस के सिलेंडरों में हो सकता है, जो रेडियोएक्टिव और हैंडलिंग में खतरनाक हैं। कजाकिस्तान में ठंड, बर्फबारी और रेडिएशन का खतरा था। ईरान में मिसाइल-ड्रोन अटैक का खतरा है, जिसके चलते रेडिएशन फैलने का सबसे ज्यादा खतरा है। कजाकिस्तान ने दोस्त बनकर मिलकर ऑपरेशन पूरा कराया था, लेकिन ईरान तो दुश्मन है, मर जाएगा या मार देगा, लेकिन यूरेनियम जाने नहीं देगा।