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क्या चीन में भी है कोई गुप्त 'जाति व्यवस्था'? सोशल मीडिया पर क्यों छिड़ी बहस; जानें क्या है 'हुकोउ' प्रणाली

इस बहस को समझने के लिए चीन के इतिहास को खंगालना जरूरी है. कम्युनिस्ट क्रांति से बहुत पहले चीनी समाज ‘शि-नोंग-गोंग-शांग’ नाम के सामाजिक ढांचे के इर्द-गिर्द संगठित था.

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असली विवाद आधुनिक चीन की 'हुकोउ' व्यवस्था को लेकर है, जिसे 1950 के दशक में माओत्से तुंग की सरकार द्वारा बेहद सख्त बना दिया गया.

चीन को दुनिया का ‘मैन्युफैक्चरिंग पावरहाउस’ और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में जाना जाता है. कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शासित यह देश आधिकारिक तौर पर समाजवादी समानता का दावा करता है. लेकिन हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर एक नई बहस ने सबका ध्यान खींचा है – क्या चीन में भी कोई जाति व्यवस्था काम कर रही है?

यह बहस तब तेज हुई जब इंटरनेट यूजर्स, विशेषकर भारतीयों ने चीन की सामाजिक संरचना की तुलना भारत की पारंपरिक व्यवस्था से करनी शुरू की. उन्होंने तर्क दिया कि चीन में भी किसी व्यक्ति के अवसर और उसका भविष्य काफी हद तक उसके जन्म की परिस्थितियों से तय होता है. इस चर्चा के केंद्र में चीन की ‘हुकोउ’ घरेलू पंजीकरण प्रणाली है.

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प्राचीन चीन का ‘चार व्यवसाय’ मॉडल

इस बहस को समझने के लिए चीन के इतिहास को खंगालना जरूरी है. कम्युनिस्ट क्रांति से बहुत पहले चीनी समाज ‘शि-नोंग-गोंग-शांग’ नाम के सामाजिक ढांचे के इर्द-गिर्द संगठित था. ईस्वी सन 111 में हान राजवंश के दौरान औपचारिक रूप दी गई इस व्यवस्था में लोगों को चार प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया था. पहली कैटेगरी शि है, जिसमें विद्वान और सरकारी अधिकारी होते थे, इन्हें समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था. दूसरे नंबर पर नोंग आते हैं, जो किसान होते थे. तीसरे नंबर पर कुशल श्रम करने वाले लोग कारीगर और शिल्पकार गोंग आते थे. वहीं, चौथे नंबर पर शांग आते हैं, जो व्यापारी और दुकानदार होते थे.

विशेषज्ञों का कहना है कि यह व्यवस्था भारत की प्राचीन ‘वर्ण व्यवस्था’ से मिलती-जुलती जरूर थी, लेकिन यह कोई कठोर वंशानुगत जाति व्यवस्था नहीं थी. इसमें सामाजिक गतिशीलता संभव थी. उदाहरण के लिए, एक साधारण व्यापारी का बेटा भी शाही परीक्षा पास करके सर्वोच्च ‘विद्वान-अधिकारी’ बन सकता था.

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कम्युनिस्ट युग की ‘हुकोउ’ प्रणाली

असली विवाद आधुनिक चीन की ‘हुकोउ’ व्यवस्था को लेकर है, जिसे 1950 के दशक में माओत्से तुंग की सरकार द्वारा बेहद सख्त बना दिया गया. हुकोउ मूल रूप से एक नागरिक को जन्म के आधार पर दो हिस्सों में बांटता है, ग्रामीण या शहरी निवासी.

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एक देश, दो दुनिया

अमेरिकी प्रकाशन डिप्लोमैटिक कूरियर के मुताबिक, इस भेदभाव ने चीन को ‘दो अलग-अलग राष्ट्रों’ में विभाजित कर दिया है. ग्रामीण हुकोउ धारक जब काम की तलाश में शहरों में आते हैं, तो उन्हें सबसे खतरनाक और कम वेतन वाली नौकरियां मिलती हैं. आर्थिक सुधारों के बावजूद उन्हें स्थानीय स्कूलों और अस्पतालों का लाभ नहीं मिलता. चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 के अंत तक चीन में अपने गृहनगर से दूर रहने वाले प्रवासियों यानी ‘फ्लोटिंग पापुलेशन’ की संख्या लगभग 35.8 करोड़ पहुंच चुकी है, जो देश की कुल आबादी का करीब एक चौथाई हिस्सा है.

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चीनी विद्वानों ने दावों को किया खारिज

चीनी समाज और बीजिंग के विश्लेषकों ने इस तुलना को पूरी तरह खारिज किया है. पेकिंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर झांग यिवू ने ‘द ग्लोबल टाइम्स’ से बात करते हुए कहा, ‘यह पूरी तरह हास्यास्पद है. ‘शि-नोंग-गोंग-शांग’ केवल एक व्यावसायिक व्यवस्था थी, कोई वंशानुगत जाति व्यवस्था नहीं. कुछ लोगों में चीन की ऐतिहासिक संस्कृति के बुनियादी ज्ञान की कमी है.’

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लेखक के बारे में

Arif Khan

आरिफ खान मंसूरी न्यूज 24 में बतौर डिप्टी न्यूज एडिटर कार्यरत हैं. आरिफ को डिजिटल पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा अनुभव हैं. उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लगातार तीन लोकसभा चुनाव के अलावा पिछले 15 सालों में देशभर में हुए विधानसभा चुनावों की भी व्यापक कवरेज की है. न्यूज 24 से पहले उन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की थी, यहां देश, दुनिया और पॉलिटिक्स की खबरों पर काम किया. आरिफ ने इसके बाद इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की हिंदी वेबसाइट जनसत्ता के साथ अपनी पारी शुरू की. इसके बाद उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स की हिंदी न्यूज वेबसाइट लाइवहिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया. लाइवहिंदुस्तान.कॉम के बाद वह एनडीटीवी ग्रुप के साथ जुड़ गए. एनडीटीवी में करीब छह साल तक काम करने के बाद न्यूज24 के साथ जुड़ गए. न्यूज24 में भी होमपेज की जिम्मेदारी संभालते हैं. शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से कला संकाय में स्नातक और मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री हासिल की है. आरिफ देश, विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरों के अलावा एक्सप्लेनर लिखने में भी माहिर हैं.
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