अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. ट्रंप की टैरिफ नीति को दुनिया भर में अमेरिका को प्राथमिकता देने वाला कदम बताया गया है. लेकिन हाल ही में Kiel Institute for the World Economy की एक नई रिपोर्ट ने ये साफ कर दिया है कि ट्रंप के टैरिफ का असली बोझ विदेशी निर्यातकों पर नहीं, बल्कि अमेरीकी उपभोक्ताओं और कंपनियों पर पड़ा है. ये स्टडी जर्मनी के एक प्रमुख आर्थिक शोध संस्थान ने की है. रिपोर्ट के मुताबिक, हकीकत में ट्रंप की टैरिफ नीति का असर अमेरिका के उपभोक्ताओं, व्यापारियों और उद्योगों की जेब पर पड़ा.
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टैरिफ क्या था और क्यों लगाया गया?
2025 में ट्रंप प्रशासन ने लगभग सभी व्यापारिक भागीदारों के सामान पर बेसलाइन 10% टैरिफ और फिर देश-विशेष पारस्परिक टैरिफ लागू किया. भारत और ब्राजील जैसे देशों के सामान पर ये दर 50% तक भी पहुंच गई. ट्रंप सरकार का दावा था कि ये टैरिफ विदेशी कंपनियों से राजस्व वसूलेंगे और अमेरिकी व्यापार घाटे को कम करेंगे. लेकिन स्टडी के निष्कर्ष ने इस सोच को चुनौती दी है.
रिपोर्ट में क्या सामने आया?
जानकारी के मुताबिक, लगभग 96% टैरिफ की लागत अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं ने झेली, जबकि करीब 4% का नुकसान विदेशी निर्यातकों को हुआ. इसका मतलब ये है कि जो टैक्स अमरीकी कस्टम्स कलेक्ट कर रहा है, वो सीधे तौर पर अमेरिकी बिजनेस और घरों की जेब से निकाला गया पैसा है. भारतीय और बाकी देशों के निर्यातकों ने अपने कपड़ों या चीजों के दामों में कटौती नहीं की, बल्कि निर्यात की मात्रा घटा दी, जिससे उन्हें घाटा कम हुआ. इसी वजह से, अमेरिकी बाजार में सामान महंगा हो गया और स्थानीय उपभोक्ता को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी.
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विदेशी निर्यातकों ने कीमतें नहीं घटाई?
रिपोर्ट बताती है कि अगर भारतीय या ब्राजीलियन निर्यातक कीमतों को उस 50% टैरिफ के मुताबिक घटाते, तो उन्हें अपने मुनाफे में भारी कटौती करनी पड़ती. इसलिए ज्यादातर कंपनियों ने दाम नहीं घटाए, बल्कि बेचने वाली मात्रा को कम किया ताकि नुकसान को रोका जा सके. टैरिफ की वजह से भारत और बाकी देशों के निर्यातकों के सप्लाई चेन में रुकावट आई. कई अमेरिकी कंपनियों को विदेशी इनपुट (जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स के पार्ट्स या सामान) महंगे दामों पर खरीदने पड़े, जिससे उनकी प्रोडक्शन लागत बढ़ी.
सरकार को कितना पैसा मिला?
स्टडी के मुताबिक, अमेरिका को टैरिफ से करीब 200 अरब डॉलर की कमाई हुई. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये पैसा भी असल में अमेरिकी जनता की जेब से ही आया. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि टैरिफ को हल्के में नहीं लेना चाहिए. अगर इसका बोझ देश के लोगों पर ही पड़ता है, तो इससे महंगाई बढ़ती है और अर्थव्यवस्था पर दबाव आता है. कुल मिलाकर रिपोर्ट से ये साफ होता है कि ट्रंप का दांव उन्हीं पर उल्टा पड़ गया है.
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