पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव हारने और बंगाल की सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी की टीएमसी में सियासी संग्राम छिड़ चुका है. टीएमसी अब तीन धड़ों में बटी हुई दिखाई दे रही है. एक गुट बागी विधायकों का तो दूसरा बागी लोकसभा सांसदों का और तीसरी गुट ममता बनर्जी के साथ खड़ा है. इस संग्राम के बाद से ही टीएमसी पर अपने-अपने नियत्रंण की लड़ाई भी तेज हो चुकी है.
टीएमसी की नई वर्किंग कमेटी का ऐलान
बता दें कि बागी विधायकों के गुट की अगुवाई कर रहे ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में सोमवार को कोलकाता में एक बैठक आयोजित की गई. इस बैठक में टीएमसी की नई वर्किंग कमेटी का भी ऐलान किया गया. इस दौरान पार्टी अध्यक्ष पद से ममता बनर्जी को हटा दिया गया है. ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी की जगह पर विधायक अरूप रॉय को टीएमसी का नया अध्यक्ष बनाया है.
दीदी को दिया ये ऑफर
खबर है कि ममता बनर्जी को सलाहकार बनाने का ऑफर भी दिया गया है. अटकलें हैं कि जल्द ही बागी गुट ECI यानी भारत निर्वाचन आयोग का रुख कर सकता है. रिताब्रता बनर्जी ने ममता बनर्जी के प्रति नरम रुख अपनाते हुए कहा कि यदि वह मुख्य सलाहकार बनना चाहें, तो उनका स्वागत है. कहा जा रहा है कि इस गुट ने प्रभावी रूप से अभिषेक बनर्जी का अधिकार भी छीन लिया है.
अब ऐसे में इस नए नाम की चर्चा लोगों के बीच हो रही है कि आखिर ममता बनर्जी की जगह पर टीएमसी के नए अध्यक्ष बने अरूप रॉय हैं कौन?
कौन हैं टीएमसी के नए अध्यक्ष अरूप रॉय?
आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में अरूप रॉय का नाम कोई नया नहीं बल्कि लोगों के बीच एक जाना माना नाम है. अरूप रॉय का जन्म पश्चिम बंगाल के हावड़ा में हुआ था. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत छात्र राजनीति से की थी और कांग्रेस पार्टी की छात्र संगठन से जुड़े थे. इसके बाद उनकी असली सियासी पारी की शुरूआत 1990 के दशक में हुई, जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर 1998 में ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ का गठन किया.
अरूप रॉय उन शुरुआती और वफादार नेताओं में से एक थे, जिन्होंने मतत बनर्जी के संघर्ष के दिनों में उनका साथ दिया. उन्होंने हावड़ा जिले में तृणमूल कांग्रेस की जड़ों को मजबूत करने के लिए जमीन पर कड़ा संघर्ष किया, जिसके चलते ममता बनर्जी के भरोसेमंद बन गए.
4 बार के विधायक हैं अरूप रॉय
बंगाल की हावड़ा मध्य विधानसभा सीट से अरूप रॉय लगातार चौथी बार विधायक हैं. साल 2011, 2016, 2021 और 2026 के चुनाव में टीएमसी के टिकट पर विधायक बने हैं. ममता बनर्जी के अगुवाई वाली सभी सरकार में अरुप राय मंत्री रह चुके हैं. इनके पास सहकारिता और कृषि विपणन जैसे मंत्रालय का जिम्मा रहा है.
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राजनीति पर मजबूत नियंत्रण
अरूप रॉय अपनी सादगी, संगठनात्मक पकड़ और हावड़ा जिले की राजनीति पर मजबूत नियंत्रण रखते हैं. ममता के करीबी नेताओं में उन्हें गिना जाता है, लेकिन अब ऋतब्रत बनर्जी के अगुवाई वाले बागी विधायकों के साथ खड़े हैं. टीएमसी के बागी गुट के विधायकों की बैठक में ममता बनर्जी की जगह पर उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है.
हावड़ा जिले के अध्यक्ष भी रहे रॉय
अरूप रॉय तृणमूल कांग्रेस के हावड़ा जिले के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. साल 2011 में जब पश्चिम बंगाल में 34 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत हुआ, तब अरूप रॉय ‘हावड़ा मध्य’विधानसभा सीट से चुनाव लड़कर विधायक बने. ममता बनर्जी ने उनकी संगठन क्षमता को देखते हुए उन्हें अपनी पहली कैबिनेट में ‘कृषि विपणन’मंत्री नियुक्त किया. इस तरह ममता की हर सरकार में अरूप रॉय मंत्री रहे.
TMC के मजबूत स्तंभों में से एक रॉय
अरूप रॉय सिर्फ एक मंत्री ही नहीं, बल्कि हावड़ा जिले में तृणमूल कांग्रेस के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक माने जाते हैं. लंबे समय तक वे टीएमसी के हावड़ा जिला अध्यक्ष रहे. हावड़ा की स्थानीय राजनीति में गुटीय कलह को शांत करने और पार्टी कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने के कारण उन्हें अक्सर पार्टी का ‘संकटमोचक’ कहा जाता है.
अरूप रॉय की सबसे बड़ी खासियत उनका जमीनी जुड़ाव है. वे हावड़ा के स्थानीय लोगों के लिए हमेशा सुलभ रहते हैं, जिसके कारण आम जनता के बीच उनकी छवि एक ‘माटी के नेता’ (जमीन से जुड़े नेता) की है.
वहीं, सहकारिता मंत्री के रूप में अरूप रॉय ने ग्रामीण बंगाल के आर्थिक ढांचे को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है. तमाम राजनीतिक उतार-चढ़ावों के बीच ममता बनर्जी के प्रति उनकी निष्ठा बदल गई और सत्ता बदलते ही बागी गुट के साथ हो गए.
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