पश्चिम बंगाल की सियासत में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रही खींचतान चर्चा का विषय बनी हुई है. इसी बीच टीएमसी की वरिष्ठ सांसद और अभिनेत्री रह चुकीं Satabdi Roy ने पहली बार खुलकर बताया है कि आखिर उन्होंने कुछ समय पहले पार्टी नेतृत्व से दूरी क्यों बनाई थी. उनका बयान ऐसे समय आया है जब पार्टी के भीतर असंतोष और गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आ रही हैं. एक मीडिया इंटरव्यू में शताब्दी रॉय ने कहा कि जब वो राजनीति में आई थीं तब ममता बनर्जी कार्यकर्ताओं और नेताओं से सीधे संवाद करती थीं. हर व्यक्ति अपनी बात उनके सामने रख सकता था और समस्याओं का समाधान भी होता था. लेकिन समय के साथ हालात बदल गए और उन्हें महसूस हुआ कि पार्टी के भीतर संवाद की कमी होने लगी है.

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क्या बोलीं शताब्दी रॉय?

शताब्दी रॉय ने कहा कि उन्होंने हमेशा ममता बनर्जी का सम्मान किया है और उन्हें अपना नेता माना है. हालांकि, उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि एक समय ऐसा आया जब उन्हें लगा कि 'दीदी बदल गईं'. उनके मुताबिक, पहले जो सहजता और अपनापन नेतृत्व में दिखाई देता था, वो धीरे-धीरे कम होता गया. इसी वजह से कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के मन में नाराजगी पैदा हुई. टीएमसी सांसद ने ये भी साफ किया कि उनकी नाराजगी किसी पर्सनल वजह से नहीं थी. उनका कहना है कि वो हमेशा पार्टी की मजबूती और संगठन के हित के बारे में सोचती रही हैं. उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को मजबूत बनाए रखने के लिए नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच लगातार संवाद जरूरी होता है. जब बातचीत कमजोर पड़ती है तो गलतफहमियां बढ़ने लगती हैं और संगठन पर उसका असर दिखाई देने लगता है.

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'किसी व्यक्ति के खिलाफ लड़ाई नहीं'

हालांकि, शताब्दी रॉय ने ये भी कहा कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है. उनका मानना है कि पार्टी को मजबूत बनाने के लिए सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलना चाहिए. उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में संगठन के भीतर संवाद बेहतर होगा और सभी की बात सुनी जाएगी. शताब्दी रॉय का ये बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वो टीएमसी की पुरानी और भरोसेमंद नेताओं में गिनी जाती हैं. वो कई बार लोकसभा सांसद चुनी जा चुकी हैं और पश्चिम बंगाल में पार्टी का एक प्रमुख चेहरा मानी जाती हैं. पिछले कुछ समय से टीएमसी के भीतर असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं. कई नेताओं ने संगठन के काम करने के ढंग और स्थानीय स्तर पर फैसले लेने के तरीके को लेकर सवाल उठाए हैं. राजनीतिक गलियारों में अब इस बयान को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं. विपक्ष इसे टीएमसी के भीतर बढ़ती नाराजगी का संकेत बता रहा है, जबकि पार्टी समर्थकों का कहना है कि लोकतांत्रिक दलों में अलग-अलग राय होना आम बात है.

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