पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) और ममता बनर्जी के लिए बहुत बड़ा सियासी संकट खड़ा हो गया है। 28 साल के इतिहास पहली बार तृणमूल कांग्रेस टूटी और पार्टी के 58 बागी विधायकों ने पार्टी से अलग होकर नया गुट बना दिया। साथ ही पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता चुन लिया। विधानसभा स्पीकर रथींद्र बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को मान्यता देकर विपक्ष का नेता बना दिया। उन्हें विधानसभा में नेता विपक्ष का रूम भी अलॉट कर दिया। जावेद खान, संदीपन साहा और सिउली साहा को उपनेता बनाया। इनके अलावा अखरुज्जमान को चीफ व्हिप बनाया गया है।

कौन हैं ममता के बागी ऋतब्रत बनर्जी, कभी वामपंथियों के थे चहेते, क्या अब बनेंगे TMC के ‘शिंदे’?

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ममता बनर्जी के समर्थन में सिर्फ 22 विधायक

घटनाक्रम पर हालांकि ममता बनर्जी का बयान नहीं आया है, लेकिन अब पार्टी का अस्तित्व बचाने के लिए ममता बनर्जी क्या करेंगी? उनके पास क्या विकल्प बचे हैं? TMC ने 294 विधानसभा सीटों में से 80 सीटें जीती थीं और ममता के पास अब सिर्फ 22 विधायकों का समर्थन है। पहली बार ऐसा हुआ है कि ममता बनर्जी की इच्छा के खिलाफ जाकर पार्टी में कोई बड़ा फैसला लेकर लागू किया गया। ऋतब्रत कहते हैं कि ममता बनर्जी का सम्मान बना रहेगा और उनकी सलाह ली जा सकती है, लेकिन पार्टी का संचालन और राजनीतिक फैसलों की कमान बागी खेमे के हाथ में रहेगी, यानी पार्टी में शक्ति संतुलन बदल गया है।

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इन वजहों से टूटी है ममता बनर्जी की TMC

बता दें कि तृणमूल कांग्रेस में टूट तब शुरू हुई, जब विपक्ष का नेता चुनने के प्रस्ताव पर फर्जी साइन का आरोप ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा पर लगा। दोनों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इस बीच TMC विधायक फिरहाद हकीम ने कोलकाता के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया। मौके का फायदा उठाकर बागी विधायकों ने निष्कासित ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुना लिया। ऋतब्रत के समर्थन में हस्ताक्षर करके लेटर देकर विधानसभा अध्यक्ष से उन्हें विपक्षी दल का नेता बनाने की मांग की। इसके अलावा अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व का विरोध और असंतोष भी TMC के टूटने की वजह है।

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पार्टी बचाने को ममता के पास ये हैं विकल्प

तृणमूल कांग्रेस को बचाने के लिए ममता बनर्जी के पास पहली विकल्प कानूनी लड़ाई का है। वह ऋतब्रत को विपक्ष का नेता बनाए जाने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती हैं। ममता गुट ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय का नाम विपक्षी दल के नेता के लिए प्रस्तावित किया था। हालांकि संसदीय मामलों में अदालतें सीधे हस्तक्षेप नहीं करतीं, लेकिन बीते समय में अदालतों ने कुछ मामलों में विधानसभा अध्यक्षों के फैसलों की समीक्षा करते हुए निर्णय दिए हैं।

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ममता बनर्जी के पास दूसरा विकल्प बागी विधायकों को पार्टी से निष्कासित करने का है। वे 58 बागी विधायकों को निष्कासित कर सकती हैं। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस की विधायकों की संख्या 20 रह जाएगी और पार्टी विपक्षी दल होने का दर्जा भी खो देगी। बागी विधायक चुनाव आयोग के पास जाकर अपने गुट को असली तृणमूल कांग्रेस बताकर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा ठोक सकते हैं। अगर चुनाव आयोग की जांच में सही साबित हुए तो तृणमूल कांग्रेस हाथ से जा सकती है।

ममता बनर्जी के पास तीसरा रास्ता बागी विधायकों से बातचीत करने का है, जो सबसे कठिन है। क्योंकि बागी विधायक पार्टी में अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व से आक्रोशित हैं। वे पार्टी से अभिषेक को निकालने की मांग कर सकते हैं। यानी तृणमूल कांग्रेस इस समय सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है। अब यह देखना होगा कि ममता बनर्जी तीनों में से क्या विकल्प चुनती हैं? अब तृणमूल का भविष्य और उसके चुनाव चिह्न एवं पार्टी का अस्तित्व ममता बनर्जी के फैसले पर निर्भर करेगा।