ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत को लेकर बंगाल में रह रहे ईरानी समुदाय के बीच शोक का माहौल है. समुदाय के लोगों ने रमजान और ईद की खुशियां न मनाने का फैसला लिया है और अपने-अपने घरों के सामने काला झंडा लगाकर 40 दिनों तक शोक मनाने की घोषणा की है. दरअसल, 28 फरवरी 2026 को इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले में उनकी मौत हो गई थी, जिसकी पुष्टि ईरानी सरकार ने 1 मार्च को की. इसके बाद मोजतबा खामेनेई को ईरान का अगला सर्वोच्च नेता बनाया गया है. लेकिन बंगाल में सैकड़ों सालों से रह रहे ईरानी समुदाय के लोग अभी भी अली खामेनेई के मौत के गम से उभर नहीं पाए हैं.
ये भी पढ़ें: ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई कितने अमीर? लंदन से दुबई तक अरबों की प्रॉपर्टी के मालिक
---विज्ञापन---
'मुगल काल के दौरान भारत आए थे'
आसनसोल के पांडेश्वर, मुर्शिदाबाद, पुरुलिया जिले के आद्रा और हुगली समेत कई इलाकों में रहने वाले ईरानी समुदाय के लोग अपने घरों के बाहर काला झंडा लगाकर शोक व्यक्त कर रहे हैं. पांडेश्वर की ईरानी बस्ती में रहने वाले 70 वर्षीय रुस्तम अली खान बताते हैं कि उनका जन्म बंगाल में ही हुआ है. उनके मुताबिक, मुगल काल के दौरान उनके पूर्वज ईरान से भारत आए थे. आज उनके परिवार के लोग बंगाल के अलावा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड समेत कई राज्यों में रहते हैं. उन्होंने बताया कि उनके समुदाय के लोगों का मुख्य पेशा पत्थर की अंगूठियां, चश्मा, मसाले, चूड़ियां और श्रृंगार के सामान का व्यापार रहा है, जो आज भी जारी है.
---विज्ञापन---
'ईरान सरकार ने दी जमीन'
रुस्तम अली खान के मुताबिक, जिस जगह पर वो लोग रह रहे हैं, वो जमीन उनके पूर्वजों को ईरान सरकार की ओर से रहने के लिए दी गई थी. यहां मदरसे और मस्जिद के साथ-साथ रहने के लिए घर भी बनाए गए थे. उन्होंने बताया कि अब उनके पास आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड सहित सभी भारतीय दस्तावेज मौजूद हैं. साथ ही वे केंद्र और राज्य सरकार की अलग-अलग योजनाओं का लाभ भी उठा रहे हैं. रुस्तम अली खान कहते हैं कि वो खुद को “भारतीय ईरानी” के रूप में पहचान देते हैं और इस पर उन्हें गर्व है.
ये भी पढ़ें: क्यों एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं सऊदी अरब और ईरान? जानिए दुश्मनी की असली वजह