पश्चिम बंगाल में दो चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बिगुल बज चुका है. चुनाव आयोग ने 23 और 29 अप्रैल 2026 को मतदान की तारीखें तय की हैं, जिसमें राज्य के 7.3 करोड़ वोटर अपनी सरकार चुनेंगे. बीजेपी के लिए जंगलमहल और उत्तर बंगाल का इलाका सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है. पुरुलिया, बांकुड़ा और झाड़ग्राम जैसे आदिवासी बहुल जिलों में पार्टी हिंदुत्व और आदिवासी पहचान के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है. वहीं उत्तर बंगाल में चाय बागान मजदूरों की मजदूरी और राजबंशी पहचान जैसे मुद्दे हावी हैं. टीएमसी यहां अपनी कल्याणकारी योजनाओं और भूमि अधिकार के वादे से बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने की पूरी कोशिश कर रही है.
मतुआ वोट बैंक और नागरिकता कानून का असर
नदिया और उत्तर 24 परगना जैसे सीमावर्ती इलाकों में मतुआ समुदाय की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है. बीजेपी सीएए यानी नागरिकता संशोधन कानून के जरिए शरणार्थियों को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रही है. दूसरी ओर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे बीजेपी का 'जाल' करार दिया है और बिना शर्त नागरिकता का नारा बुलंद किया है. हालिया मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) के चलते मतुआ समुदाय के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हुई है जिसका फायदा उठाने के लिए टीएमसी सक्रिय है. इस क्षेत्र की लगभग 30-40 सीटों पर होने वाला ध्रुवीकरण यह तय करेगा कि राज्य की सत्ता की चाबी किसके हाथ में जाएगी.
---विज्ञापन---
यह भी पढ़ें: ओडिशा में बड़ा हादसा, सरकारी अस्पताल के ICU वार्ड में लगी आग, 10 मरीजों की मौत
---विज्ञापन---
शहरी किला और औद्योगिक-कृषि क्षेत्र की जंग
कोलकाता और उसके आसपास का शहरी इलाका आज भी टीएमसी का सबसे मजबूत अजेय किला बना हुआ है. यहां ममता बनर्जी की पकड़ ढीली करने के लिए बीजेपी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और मध्यवर्ग की नाराजगी को बड़ा मुद्दा बना रही है. हुगली, हावड़ा और दुर्गापुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में स्थिति बेहद प्रतिस्पर्धी है क्योंकि यहां कई सीटों पर जीत का अंतर 5,000 वोटों से भी कम रहा है. इन इलाकों में बंद पड़ी फैक्ट्रियां और श्रमिकों की समस्याएं चुनाव के नतीजों को किसी भी तरफ मोड़ सकती हैं. टीएमसी अपने मजबूत लाभार्थी नेटवर्क और स्थानीय क्लबों के सहयोग पर भरोसा कर रही है जबकि बीजेपी सत्ता विरोधी लहर को भुनाने में जुटी है.
---विज्ञापन---
अल्पसंख्यक बेल्ट और तीसरे मोर्चे की चुनौती
मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे अल्पसंख्यक बहुल जिलों में इस बार मुकाबला बहुकोणीय होने की संभावना है. टीएमसी इन क्षेत्रों में मुस्लिम वोटों को एकजुट रखने की कोशिश कर रही है ताकि बीजेपी को रोका जा सके. हालांकि स्थानीय नेता हुमायूं कबीर द्वारा नई पार्टी बनाना और 'बाबरी मस्जिद' अभियान शुरू करना टीएमसी के लिए चिंता का विषय बन सकता है. कांग्रेस और वामपंथी गठबंधन भी इस क्षेत्र में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की जद्दोजहद कर रहे हैं. अगर अल्पसंख्यक वोटों का बंटवारा होता है तो इसका सीधा फायदा कुछ सीटों पर बीजेपी को मिल सकता है. यह चुनाव तय करेगा कि बंगाल का राजनीतिक भविष्य किस दिशा में जाएगा.
---विज्ञापन---
---विज्ञापन---