राज्यसभा के इस बार के दोवार्षिक चुनाव कई मायनों में खास माने जा रहे हैं. इस बार चुनाव तीन चरणों में हो रहे हैं. पहले चरण में अप्रैल में 37 सीटों पर चुनाव हो चुका है. अब जून में दूसरे चरण के तहत 24 सीटों पर मतदान होना है, जबकि तीसरे चरण में साल के अंत में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की 10 सीटों पर चुनाव होगा. इसके साथ ही महाराष्ट्र और तमिलनाडु की दो सीटों पर उपचुनाव भी होने हैं. कुल मिलाकर इस साल 72 सीटों पर चुनाव की प्रक्रिया चल रही है.

इन चुनावों ने सिर्फ राज्यसभा की तस्वीर ही नहीं बदली है, बल्कि एनडीए और इंडिया गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर अंदरूनी खींचतान भी तेज कर दी है. आने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए सभी दल इन चुनावों को राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देख रहे हैं.

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सबसे ज्यादा चर्चा बिहार और कर्नाटक को लेकर हो रही है. बिहार में विधान परिषद की 9 सीटों पर चुनाव होना है, जबकि एक सीट पर उपचुनाव होगा. उपचुनाव वाली सीट मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे से खाली हुई है और यह सीट जेडीयू के खाते में जाना तय माना जा रहा है. लेकिन बाकी सीटों के बंटवारे को लेकर बीजेपी और जेडीयू के बीच लगातार बातचीत चल रही है.

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पहले माना जा रहा था कि बीजेपी और जेडीयू बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, लेकिन अब चर्चा है कि बीजेपी ज्यादा सीटें अपने पास रखना चाहती है. सूत्रों के मुताबिक बीजेपी चार सीटों पर दावा कर रही है, जबकि जेडीयू को दो सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है. इसे लेकर दोनों दलों के बीच मंथन जारी है.

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जेडीयू अपने सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखकर उम्मीदवारों के नाम तय करना चाहती है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार मंत्री बने हैं ऐसे में उनको विधान परिषद भेजा ही जाना है. इसके अलावा राजीव रंजन और ललन कुमार के नाम भी चर्चा में हैं. वहीं बीजेपी की ओर से संजय मयूख का नाम सबसे आगे माना जा रहा है. विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दल अपने-अपने प्रभाव और हिस्सेदारी को मजबूत दिखाना चाहते हैं, इसलिए सीटों को लेकर दबाव की राजनीति साफ दिखाई दे रही है.

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उधर कर्नाटक में राज्यसभा की चार सीटों पर चुनाव होना है. विधानसभा में संख्या बल के हिसाब से कांग्रेस को तीन और बीजेपी को एक सीट मिलना लगभग तय माना जा रहा है. लेकिन कांग्रेस के भीतर उम्मीदवारों को लेकर खींचतान तेज हो गई है.

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का राज्यसभा जाना लगभग तय माना जा रहा है. लेकिन बाकी दो सीटों पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच अंदरूनी खींचतान बढ़ गई है. डीके शिवकुमार अपने भाई और पूर्व सांसद डीके सुरेश को राज्यसभा भेजना चाहते हैं. वहीं सिद्धारमैया खेमे की ओर से भी अपने समर्थकों के नाम आगे बढ़ाए जा रहे हैं.

इसी बीच कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा भी तेज हो गई है. दोनों नेताओं को दिल्ली बुलाए जाने के बाद सियासी अटकलें और बढ़ गई हैं. माना जा रहा है कि कांग्रेस आलाकमान राज्य में संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में अब खबर ये भी है कि मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद सिद्धारमैया भी राज्यसभा जाएँगे .

बीजेपी के सामने भी कर्नाटक में चुनौती कम नहीं है. पार्टी को यह तय करना है कि वह अपनी एकमात्र संभावित सीट खुद रखे या सहयोगी जेडीएस को दे. जेडीएस संस्थापक और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा का कार्यकाल खत्म हो रहा है और पार्टी चाहती है कि उन्हें फिर से राज्यसभा भेजा जाए. ऐसे में बीजेपी के सामने सहयोगी धर्म निभाने और अपने संगठनात्मक हितों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है.

झारखंड में भी इंडिया गठबंधन के भीतर सहमति नहीं बन पा रही है. राज्यसभा की दो सीटों में से एक सीट जेएमएम के संस्थापक शिबू सोरेन की थी, जो उनके निधन के बाद खाली हुई. दूसरी सीट बीजेपी के दीपक प्रकाश की है. जेएमएम और कांग्रेस दोनों दूसरी सीट पर दावा कर रहे हैं. कांग्रेस का कहना है कि पिछले कई चुनावों में उसे राज्यसभा सीट नहीं मिली है, जबकि जेएमएम अपनी पार्टी का उम्मीदवार उतारना चाहता है. इस खींचतान का फायदा बीजेपी उठाने की कोशिश में है.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की एक सीट को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं. पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के राज्यसभा नहीं जाने के संकेत के बाद कमलनाथ, जीतू पटवारी और किसी बड़े दलित चेहरे को राज्यसभा भेजने की चर्चा चल रही है. कांग्रेस के भीतर अलग-अलग गुट अपने-अपने नेताओं को आगे बढ़ाने में जुटे हैं.

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महाराष्ट्र में भी राजनीतिक हलचल कम नहीं है. सुनेत्रा पवार के इस्तीफे से खाली हुई राज्यसभा सीट को लेकर अजित पवार खेमे में चर्चाएं तेज हैं. राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या पवार परिवार से ही किसी और सदस्य को राज्यसभा भेजा जाएगा.

राज्यसभा और विधान परिषद के ये चुनाव सिर्फ सदन की सीटों तक सीमित नहीं हैं. यह आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक ताकत दिखाने और सहयोगियों के बीच हिस्सेदारी तय करने की लड़ाई भी है. यही वजह है कि एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों के भीतर सीटों को लेकर खींचतान लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है.