मुख्य जानकारी:
- यूपी रेरा ने मेंटेनेंस सिक्योरिटी (IFMS) के पैसों को लेकर नए और बेहद सख्त नियम तुरंत लागू कर दिए हैं.
- बिल्डर अब मेंटेनेंस का पैसा अपने पर्सनल खाते में नहीं रख सकेंगे, उन्हें सबसे ज्यादा ब्याज वाली एफडी करानी होगी.
- रेरा ने ग्रुप हाउसिंग के लिए 20 रुपये से 100 रुपये और कमर्शियल दुकानों के लिए 40 से 50 रुपये प्रति वर्ग फुट का चार्ज तय किया है.
- कॉमन एरिया हैंडओवर करते समय बिल्डर को आरडब्ल्यूए (RWA) के खाते में पूरा पैसा ट्रांसफर कर लिखित हिसाब देना होगा.
- इस फंड का हर साल सीए से ऑडिट कराना होगा और तीन महीने के अंदर रिपोर्ट आम सभा में पेश करनी होगी.
उत्तर प्रदेश में घर खरीदने वाले लाखों फ्लैट बायर्स के लिए एक बेहद बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है. अक्सर देखा जाता है कि बिल्डर्स मेंटेनेंस सिक्योरिटी के नाम पर ग्राहकों से लाखों रुपये जमा करा लेते हैं, लेकिन बाद में उस पैसे का कोई सही हिसाब-किताब नहीं देते हैं. अब इसी मनमानी पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए यूपी रेरा (UP RERA) ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए इंटरेस्ट फ्री मेंटेनेंस सिक्योरिटी (IFMS) को लेकर नए और बेहद सख्त नियम लागू कर दिए हैं. इन नए नियमों के मुताबिक अब फ्लैट की रजिस्ट्री के समय बिल्डर जो भी मेंटेनेंस सिक्योरिटी का पैसा ग्राहकों से लेगा, उसे वह अपने किसी पर्सनल या चालू खाते में बिल्कुल नहीं रख सकेगा. बिल्डर को इस पैसे के लिए एक अलग और खास बैंक अकाउंट खोलना होगा और उस राशि को उस बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) कराना होगा जो सबसे ज्यादा ब्याज दे रही हो, जिससे ग्राहकों का पैसा सुरक्षित रहे और उस पर ब्याज भी बढ़ता रहे.
आरडब्ल्यूए को सौंपना होगा पाई-पाई का हिसाब
यूपी रेरा ने बिल्डरों द्वारा वसूले जाने वाले मनमाने चार्ज को रोकने के लिए प्रॉपर्टी के साइज और कैटेगरी के हिसाब से मेंटेनेंस सिक्योरिटी की दरें भी पूरी तरह फिक्स कर दी हैं. इसके अलावा बिल्डरों को प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद कॉमन एरिया जैसे पार्क, लिफ्ट और क्लब हाउस निवासियों की संस्था यानी आरडब्ल्यूए (RWA) या एओए (AOA) को सौंपते समय इस पूरे फंड को उनके खाते में ट्रांसफर करना होगा. इसके साथ ही बिल्डर को एक-एक पैसे का लिखित हिसाब देना होगा कि किस फ्लैट मालिक से कितना पैसा मिला और उसमें से कितना खर्च हुआ. इन नियमों को बारीकी से समझने के लिए नीचे दी गई तालिका की मदद ली जा सकती है.
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फंड के इस्तेमाल और ऑडिट के बने कड़े नियम
नए नियमों के अनुसार इस विशेष फंड से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल केवल सोसायटी की लिफ्ट, पार्क, जेनरेटर और सामूहिक उपकरणों की मरम्मत या उन्हें बदलने के लिए ही किया जा सकेगा. इस पैसे को रोजमर्रा के दूसरे छोटे-मोटे मेंटेनेंस खर्चों से बिल्कुल अलग रखना होगा. अब आरडब्ल्यूए या एओए की भी यह जिम्मेदारी होगी कि वे हर साल एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से इस पूरे फंड का ऑडिट जरूर कराएं और ऑडिट रिपोर्ट आने के तीन महीने के भीतर इसे सोसायटी की आम सभा (AGM) में सभी निवासियों के सामने अनिवार्य रूप से पेश करें ताकि कोई हेराफेरी न हो सके. यूपी रेरा के अध्यक्ष संजय आर. भूसरेड्डी ने कहा कि घर खरीदार यह पैसा अपनी गाढ़ी कमाई से देते हैं, इसलिए इस नए फैसले से पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और बिल्डरों की जवाबदेही तय होगी.
निष्कर्ष:
यूपी रेरा का यह ऐतिहासिक फैसला रियल एस्टेट सेक्टर में बिल्डरों की तानाशाही को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम है. इस नए नियम से न केवल घर खरीदारों की गाढ़ी कमाई पूरी तरह सुरक्षित रहेगी, बल्कि सोसायटियों के रख-रखाव में भी पारदर्शिता आएगी.
Q1. यूपी रेरा ने मेंटेनेंस सिक्योरिटी के पैसों को सुरक्षित रखने के लिए क्या नया नियम बनाया है?
Q2. मल्टीस्टोरी फ्लैट्स के लिए यूपी रेरा ने मेंटेनेंस सिक्योरिटी की क्या दरें तय की हैं?
Q3. कमर्शियल दुकानों के लिए मेंटेनेंस सिक्योरिटी का क्या रेट तय किया गया है?
Q4. प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद बिल्डर को यह मेंटेनेंस फंड किसे और कैसे ट्रांसफर करना होगा?
Q5. मेंटेनेंस फंड में किसी भी तरह की हेराफेरी को रोकने के लिए ऑडिट का क्या नियम है?
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