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कोटा में अंग्रेजों के कब्रिस्तान पर लिखा, 1857 क्रांति के भारतीय सिपाही खून के प्यासे और बदमाश

राजस्थान के कोटा में अंग्रेजों के पुराने कब्रिस्तान में लगी एक शिलालेख पर 1857 के भारतीय क्रांतिकारियों को “खून का प्यासा और बदमाश” बताया गया है, जबकि अंग्रेज अफसर को वीर कहा गया है. आजादी के 75 साल बाद भी इस विवादित लिखावट को लेकर सवाल उठ रहे हैं और इसे हटाने की मांग तेज हो गई है.

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राजस्थान के कोटा शहर में एक ऐसा कब्रिस्तान है जो सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि इतिहास की सोच पर भी सवाल खड़ा करता है. यहां एक अंग्रेज अफसर की कब्र पर लिखा है कि अंग्रेज वीर थे और 1857 की क्रांति के भारतीय सिपाही खून के प्यासे और बदमाश. आजादी के 75 साल से ज्यादा समय बाद भी यह शब्द उसी तरह पत्थर पर दर्ज हैं. सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ इतिहास है या फिर इतिहास की एकतरफा कहानी?

कोटा शहर के नयापुरा इलाके में मौजूद है अंग्रेजों का यह पुराना कब्रिस्तान यहीं दफन हैं ब्रिटिश एजेंट मेजर चार्ल्स बर्टन और उनके दो बेटे, जिनकी 15 अक्टूबर 1857 को क्रांतिकारियों ने हत्या कर दी थी.
कब्र पर लगी पत्थर की पट्टिका मेजर बर्टन की पत्नी ने लगवाई थी. लेकिन इस पट्टिका पर लिखी भाषा आज भी विवाद खड़ा करती है. इसमें 1857 की क्रांति के भारतीय सिपाहियों को हत्यारा, बदमाश और खून का प्यासा बताया गया है… जबकि अंग्रेजों को वीर कहा गया है. इतिहासकारों के मुताबिक यह वही क्रांति थी जिसे भारत में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी.

इतिहासकारों के मुताबिक 15 अक्टूबर 1857 को लाला जयदयाल और मेहराब खान के नेतृत्व में हजारों लोग रेजिडेंसी पहुंच गए थे.भीड़ ने अंग्रेजी सत्ता के प्रतीक मेजर बर्टन और उनके बेटों को मार दिया. इतिहास की किताबें बताती हैं कि उस दिन जनता का आक्रोश इतना ज्यादा था कि बर्टन का सिर काटकर शहर में घुमाया गया. सरकारी खजाने, भंडारगृह और तोपखानों पर कब्जा कर लिया गया और करीब छह महीने तक कोटा क्रांतिकारियों के नियंत्रण में रहा.

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यह विद्रोह सिर्फ सैनिकों का नहीं था… बल्कि आम जनता की अंग्रेजों के खिलाफ गहरी नाराजगी का विस्फोट था.इतिहास बताता है कि 30 मार्च 1858 को अंग्रेजों ने भीषण संघर्ष के बाद कोटा पर दोबारा कब्जा किया था. इसके बाद शहर में लूटपाट हुई. कई घर जला दिए गए और कई लोगों को फांसी पर चढ़ा दिया गया. यही कारण है की इस शिलालेख और अंग्रेजी हुकूमत की जुल्म वाली बातों को याद करके अब bjp विधायक भी इसे तत्काल हटाने की मांग कर रहे हैं.

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हालांकि कुछ इतिहासकारों का कहना है कि यह शिलालेख भले ही आपत्तिजनक भाषा में लिखा गया हो… लेकिन यह भी इतिहास का हिस्सा है. कोटा हेरिटेज सोसाइटी इसे ऐतिहासिक स्मारक के रूप में सहेजकर रखे हुए है. लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि जिन भारतीय नायकों ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी… उनके सम्मान में आज भी वैसी कोई स्मारक पट्टिका क्यों नहीं है? बहरहाल, आज सवाल सिर्फ एक कब्र या एक शिलालेख का नहीं है. सवाल यह है कि इतिहास किस नजरिए से लिखा गया था और आज हम उसे किस नजरिए से पढ़ रहे हैं क्योंकि पत्थर पर लिखे शब्द भले ही 169 साल पुराने हों… लेकिन उनसे उठने वाले सवाल आज भी उतने ही नए हैं.

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