खबर की मुख्य बातें:-
- मुंबई में भारी बारिश का सबसे बड़ा कारण इसकी भौगोलिक स्थिति है, जहां अरब सागर से आने वाली मानसूनी हवाएं बड़ी मात्रा में नमी लेकर पहुंचती हैं.
- पश्चिमी घाट की पहाड़ियों के कारण ओरोग्राफिक रेनफॉल होता है, जिससे बादल ऊपर उठकर तेजी से बारिश करते हैं.
- जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते तापमान के कारण मुंबई में कम समय में अत्यधिक बारिश और जलभराव की घटनाएं बढ़ रही हैं.
आपने अक्सर गौर किया होगा कि जब भी भारत में मानसून दस्तक देता है, तब सभी की नजरें मुंबई पर टिक जाती है. क्योंकि हर साल मुंबई को भारी बारिश का सामना करना पड़ता है, जिससे न सिर्फ रेल सेवा प्रभावित होती है, हवाई सेवा और कई शहरों के बीच सड़क सेवा भी प्रभावित हो जाती है. बारिश के कारण जलभराव, लगातार कई दिनों तक भारी बारिश होना, लोगों की मौत आदि की खबरें दिल दहला देती है. इस स्थिति को देखते लोगों के मन में सवाल रहता है कि आखिर मुंबई और आसपास के इलाकों में इतनी ज्यादा बारिश होती क्यों है? आखिर क्या वजह है कि यहां के लोगों को हर साल इस तरह की बारिश का सामना करना पड़ता है. आइए जानते हैं मुंबई में क्यों मौसम खेलता है ऐसा खेल?
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क्यों होती हैं इतनी ज्यादा बारिश मुंबई में?
मुंबई की अत्यधिक बारिश का सबसे पहला और बड़ा कारण इसकी भौगोलिक स्थिति है. मुंबई सीधे अरब सागर के किनारे पर बसी हुई है. ऐसे में जब जून के महीने में दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत के पश्चिमी तट पर कदम रखता है, तो समंदर के ऊपर से गुजरते समय हवाएं अपने साथ बड़ी मात्रा में नमी समेट लेती हैं. चूंकि मुंबई ठीक इसी नमी वाले रास्ते के सामने पड़ती है, इसलिए समंदर से उठने वाले ये भारी बादल जैसे ही जमीन से टकराते हैं, वहीं लगातार और रिकॉर्ड तोड़ बारिश शुरू हो जाती है. समंदर के पास होने की वजह से बादलों को लगातार नमी मिलती रहती है, जिससे यहां कई दिनों तक बिना रुके पानी बरसता रहता है. यही वजह है कि मुंबई की बारिश हर साल पहले से ज्यादा होती है और लगातार कई दिनों तक चलती रहती है.
ओरोग्राफिक रेनफॉल' का प्राकृतिक चक्र
मुंबई में होने वाली तेज बारिश के पीछे इसके ठीक बगल में खड़ी 'पश्चिमी घाट' (Western Ghats) की ऊंची पहाड़ियों की एक बेहद अहम भूमिका है. वैज्ञानिक भाषा में इस भौगोलिक प्रक्रिया को 'ओरोग्राफिक रेनफॉल' कहा जाता है. दरअसल, जब अरब सागर से उठने वाली मानसूनी हवाएं मुंबई को पार करके आगे बढ़ने की कोशिश करती हैं, तो पूर्व में मौजूद ये ऊंचे पहाड़ एक अभेद्य दीवार बनकर उन्हें रोक लेते हैं. पहाड़ों से टकराकर इन गर्म और नमी से भरी हवाओं को मजबूरी में ऊपर की तरफ उठना पड़ता है. ऐसे में जैसे-जैसे हवा ऊंचाई पर जाती है, वह ठंडी होने लगती है और उसमें मौजूद पानी की बूंदें तेजी से भारी होकर मुंबई और उसके आसपास के मैदानी इलाकों में मूसलाधार बनकर बरस जाती हैं.
जलवायु परिवर्तन भी बढ़ा रहा मुसीबत
हाल के सालों में मुंबई का मानसून पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक हो गया है, जिसका सीधा कनेक्शन ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज से है. पृथ्वी का तापमान बढ़ने के कारण अरब सागर का पानी भी लगातार गर्म हो रहा है. विज्ञान का सीधा नियम है कि पानी जितना गर्म होगा, भाप (नमी) उतनी ही ज्यादा बनेगी. यही वजह है कि अब मुंबई के ऊपर कम समय में बहुत ज्यादा पानी से भरे बादल जमा हो जाते हैं. इसके चलते 'एक्सट्रीम रेनफॉल' यानी अत्यधिक भारी बारिश की घटनाएं बढ़ गई हैं, जहां पहले जो पानी पूरे हफ्ते भर में गिरता था, वह अब सिर्फ एक या दो दिन में ही बरस जाता है.
लो-प्रेशर मानसून सिस्टम भी बड़ी वजह
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, भारत में मानसून सबसे पहले केरल के रास्ते प्रवेश करता है और फिर पश्चिमी तट के सहारे बहुत तेजी से आगे बढ़ते हुए मुंबई पहुंचता है. मुंबई मानसून के सबसे शुरुआती और मुख्य रास्तों में से एक है, इसलिए यहां बादलों की ताकत देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले बहुत ज्यादा होती है. इसके अलावा, मानसून के सीजन में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में अक्सर कम दबाव के क्षेत्र (Low-Pressure Systems) बनते रहते हैं. जब भी ऐसा कोई चक्रवाती सिस्टम महाराष्ट्र के तटीय इलाकों की तरफ बढ़ता है, तो वह अपने साथ अतिरिक्त बादल खींच लाता है, जिसके कारण मुंबई में महज कुछ ही घंटों के भीतर 200 से 300 मिलीमीटर तक रिकॉर्ड तोड़ बारिश दर्ज की जाती है.
| कारण | कैसे बढ़ती है मुंबई में बारिश? |
|---|---|
| अरब सागर का प्रभाव | मुंबई समुद्र के किनारे स्थित है. अरब सागर से आने वाली मानसूनी हवाएं बड़ी मात्रा में नमी लेकर आती हैं, जिससे भारी बारिश होती है. |
| पश्चिमी घाट की भूमिका | पश्चिमी घाट की पहाड़ियां नमी वाली हवाओं को ऊपर उठने पर मजबूर करती हैं, जिससे ओरोग्राफिक रेनफॉल के कारण तेज बारिश होती है. |
| दक्षिण-पश्चिम मानसून | जून में पहुंचने वाला मानसून मुंबई के तटीय क्षेत्र से टकराता है, जिससे लंबे समय तक बारिश का सिलसिला चलता है. |
| लो-प्रेशर सिस्टम | अरब सागर में बनने वाले कम दबाव वाले क्षेत्र अतिरिक्त बादलों को खींचते हैं, जिससे कम समय में बहुत ज्यादा बारिश हो सकती है. |
| जलवायु परिवर्तन | समुद्र के बढ़ते तापमान के कारण हवा में नमी बढ़ रही है, जिससे अत्यधिक बारिश और अचानक जलभराव की घटनाएं बढ़ रही हैं. |
| सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र | मुंबई के निचले इलाकों, सड़कों, रेलवे नेटवर्क और तटीय क्षेत्रों में भारी बारिश का असर सबसे ज्यादा देखने को मिलता है. |
| बचाव के उपाय | बेहतर ड्रेनेज सिस्टम, मैंग्रोव संरक्षण और आधुनिक मौसम पूर्वानुमान तकनीक से बारिश के प्रभाव को कम किया जा सकता है. |
भविष्य में मुंबई की स्थिति हो सकती है और खराब
मौसम विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले सालों में मुंबई में भारी बारिश और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा और ज्यादा बढ़ सकता है. प्रकृति के इस बदलते रूप से निपटने के लिए अब मुंबई को अपनी शहरी प्लानिंग में बड़े बदलाव करने होंगे. आने वाले समय में शहर के ड्रेनेज सिस्टम को आधुनिक बनाने, तटीय इलाकों में मौजूद मैंग्रोव (सदाबहार जंगलों) को बचाने और मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने वाली तकनीकों पर युद्ध स्तर पर काम करना होगा. तभी जाकर मुंबई को हर साल मानसून में लगने वाले इस भयानक ब्रेक से बचाया जा सकेगा और लोगों का जीवन सुरक्षित रखा जा सकेगा.
मुख्य निष्कर्ष:-मुंबई में हर साल होने वाली भारी बारिश के पीछे समुद्र, मानसूनी हवाएं, पश्चिमी घाट और बदलता मौसम प्रमुख कारण हैं. आने वाले समय में बेहतर शहरी योजना और मजबूत ड्रेनेज सिस्टम से बारिश की चुनौतियों को कम किया जा सकता है.
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