ये भी कहा जा रहा है कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ दोष साबित करने में विफल रहा जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। तीनों लोगों में रवि कुमार, राहुल और विनोद को 2014 में निचली अदालत ने दोषी ठहराया था और मौत की सजा सुनाई। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मौत की सजा को बरकरार रखा था, पुरुषों की तुलना शिकारियों से की थी।
किस चूक को सुप्रीम कोर्ट ने बनाया फैसले का आधार
तीनों आरोपियों को जब पकड़ा गया तो उनके डीएनए सैंपल लिए गए। अगले 11 दिनों तक वो सैंपल पुलिस थाने के मालखाने में ही पड़े रहे। कहा जा रहा है कि इसी घोर लापरवाही को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले का आधार बनाया।
इसके अलावा बचाव पक्ष की दलील थी गवाहों ने भी आरोपियों की पहचान नहीं की थी। कुल 49 गवाहों में 10 का क्रॉस एक्जामिनेशन नहीं कराया गया था।