बिहार के लखीसराय जिले के प्रसिद्ध अशोक धाम मंदिर में सावन के तीसरे सोमवार को जलाभिषेक के दौरान अचानक भगदड़ मचने की वजह से 7 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई. सुबह करीब 6:30 बजे अशोक धाम स्टेशन से मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर भगदड़ मचने से हड़कंप मच गया. हालांकि अभी तक प्रशासन की ओर से स्पष्ट आंकड़ा जारी नहीं किया गया है, इस हादसे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दुख प्रकट किया है. हादसे के बाद राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए 4-4 लाख रुपये के मुआवजे का भी ऐलान कर दिया है. लखीसराय भगदड़ मामले पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं, आखिर भीड़ में अफरा-तफरी क्यों मची और भगदड़ क्यों मची, ये बड़ा सवाल है.
करंट की अफवाह से बिगड़े हालात
लखीसराय के डीएम शैलेंद्र कुमार के मुताबिक, अशोक धाम स्टेशन से मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर पहले से एक बिजली का पोल गिरा हुआ था. स्टेशन पर दो ट्रेनों के एक साथ रुकने की वजह से भीड़ बढ़ गई. सोमवार सुबह बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए पहुंच रहे थे. इसी दौरान किसी ने बिजली के पोल में करंट होने की अफवाह फैला दी. जिसके बाद देखते ही देखते यह खबर भीड़ में फैल गई और लोग घबराकर इधर-उधर भागने लगे. भीड़ से अचानक बढ़े दबाव के कारण बैरिकेडिंग टूट गई.
गर्मी और भीड़ भी बनी वजह
रास्ता संकरा होने और भारी भीड़ के चलते कई श्रद्धालु अपना संतुलन खो बैठे और एक-दूसरे के ऊपर गिर गए. इसी दौरान कुछ लोग भीड़ के नीचे दब गए. डीएम ने यह भी कहा कि मंदिर परिसर में अत्यधिक भीड़ और गर्मी के कारण स्थिति और गंभीर हुई. फिलहाल पुलिस और प्रशासन हादसे से जुड़े सभी पहलुओं की जांच कर रहे हैं. घायलों का इलाज अलग-अलग अस्पतालों में कराया जा रहा है.
2019 में भी हुआ था ऐसा हादसा
अशोक धाम मंदिर में भगदड़ का यह पहला मामला नहीं है. वर्ष 2019 में भी जलाभिषेक के दौरान पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किए जाने की अफवाह फैलने के बाद श्रद्धालुओं में भगदड़ मच गई थी. उस घटना में एक श्रद्धालु की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे. उस समय भी प्रशासन ने अत्यधिक गर्मी को हादसे की प्रमुख वजहों में बताया था.
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क्यों खास है अशोक धाम?
आपको बता दें कि अशोक धाम को इंद्रदमनेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. यहां स्थापित विशाल शिवलिंग की में श्रद्धालुओं की बड़ी आस्था है. मान्यता है कि वर्ष 1977 में अशोक नाम के एक चरवाहे को गिल्ली-डंडा खेलते समय शिवलिंग दिखाई दिया था. इसके बाद यहां पूजा शुरू हुई और चरवाहे के नाम पर इसका नाम अशोक धाम पड़ा. सावन में देवघर से लौटने वाले बड़ी संख्या में कांवरिया यहां दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं, जिससे मंदिर परिसर में भीड़ कई गुना बढ़ जाती है.
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