आज से जातिगत जनगणना का पहला चरण
बिहार में आज से जातीय जनगणना का पहला चरण शुरू हो गया है जो 21 जनवरी तक चलेगा। पहले चरण में करीब पांच लाख कर्मी घर-घर जाकर घर के मुखिया के नाम से लेकर परिवार के सदस्यों के बारे मे पूछेंगे। दूसरे चरण में हर घर में मौजूद परिवार की जाति और स्किल के बारे में जानकारी जुटाई जाएगी। दूसरे चरण में 1 अप्रैल से 30 अप्रैल तक स्किल के साथ लोगों की जाति की गिनती की जाएगी। दोनों चरणों की रिपोर्ट जून 2023 में जारी की जाएगी। बता दें कि दोनों चरणों में मिलाकर बिहार में रहने वाली 204 जातियों की गिनती की जाएगी। और पढ़िए – उत्तराखंड के CM धामी पहुंचे जोशीमठ, प्रभावित परिवारों से मुलाकात कर जाना हालगणना कर्मियों के पास 10 सवालों वाला फॉर्मेट
गणना कर्मियों के अनुसार उनके पास जो फॉर्मेट है, उसमे 10 कॉलम हैं। इन कॉलम में दिए गए सवाल पूछकर लोगों के जवाब के अनुसार उसे भरना है। हालांकि, अभी ये काम मैन्युअली किया जा रहा है। इसमें एक अपार्टमेंट को एक भवन और उसमे फ्लैट को मकान माना जाएगा। कर्मियों के अनुसार यदि एक फ्लैट मे दो परिवार है और दोनों का दरवाजा अलग है तो उन्हें दो मकान माना जायेगा। पटना के जिलाधिकारी डॉक्टर चंद्रशेखर सिंह के अनुसार यदि कोई नौकरी करने के लिए बाहर गया है और उसका मकान पटना में है तो उनकी गिनती भी की जाएगी। कॉलम मे ऐसे लोगों के बारे में भी जानकारी लिखी जाएगी। और पढ़िए –पंजाब के कैबिनेट मंत्री फौजा सिंह सरारी ने दिया इस्तीफा, ऑडियो टेप हुआ था वायरलबिहार में 1931 में आखिरी बार हुई थी जातिगत जनगणना
बिहार में इससे पहले ब्रिटिश शासन काल में 1931 में जाति गणना हुई थी। इसके बाद बिहार में ऐसी कोई गणना नहीं हुई है। केंद्र सरकार के द्वारा 2011 में जनगणना कराई गई थी। उसके बाद आर्थिक-सामाजिक सर्वेक्षण हुआ था। लेकिन, इसका डेटा जारी नहीं किया गया।जातिगत जनगणना की जरूरत क्या है?
देश को 1947 को मिली आजादी के बाद पहली बार 1951 में जनगणना हुई थी। आजादी के बाद से लेकर अब तक की जनगणना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों का आंकड़ा बताया जाता है लेकिन बाकी जातियों का डेटा नहीं पब्लिश किया जाता। ऐसे में देश की OBC आबादी और अन्य जातियों का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।
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एक्सपर्ट्स की मानें तो देश में SC और ST वर्ग को जो आरक्षण मिलता है, उसका आधार उनकी जनसंख्या है, लेकिन डेटा नहीं होने से OBC आरक्षण का कोई मौजूदा आधार नहीं है। वहीं, जातिगत जनगणना की मांग करने वालों का दावा है कि आंकड़ों के आने के बाद पिछड़े-अति पिछड़े वर्ग के लोगों की शैक्षणिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक स्थिति का पता चलेगा। फिर उनकी बेहतरी के लिए नीतियों का निर्धारण किया जा सकेगा।
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