बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में मौजूद एक अनोखा गांव इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है. स्थानीय लोग इसे ‘इंग्लिश गांव’ के नाम से जानते हैं. इस गांव की सबसे बड़ी खासियत ये है कि लगभग 51 बीघा जमीन में फैला पूरा गांव एक ही परिवार के लोगों ने बसाया है. कई पीढ़ियों से एक ही वंश के लोग यहां रहते आ रहे हैं और आज भी उनकी पारिवारिक पहचान इस गांव की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है. गांववालों के मुताबिक, गांव का इतिहास काफी पुराना है. समय के साथ परिवार का विस्तार हुआ, लेकिन लोगों ने अलग-अलग जगह बसने के बजाय अपने पूर्वजों की जमीन पर ही रहना पसंद किया. यही वजह है कि आज भी गांव के ज्यादातर घर एक ही परिवार की अलग-अलग शाखाओं के हैं. गांव में रहने वाले लोग एक-दूसरे को रिश्तेदारी के जरिये जानते हैं और सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं.
ये भी पढ़ें: कौन थे बिहार के भरत तिवारी? पुलिस की गोली लगने से मौत और अब मचा बवाल, 3 पुलिसकर्मी भी सस्पेंड
अंग्रेजों से जुड़ा है गांव का कनेक्शन
'इंग्लिश गांव' नाम पड़ने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी बताई जाती है. इस बारे में गांव के सबसे सीनियर नागरिक सुदामा सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि उनके पूर्वज फली सिंह ब्रिटिश सरकार में सूबेदार थे, जिन्होंने एक लड़ाई में शानदार जीत हासिल की. बाद में जब वो रिटायर हुए तो ब्रिटिश सरकार में उन्हें तोहफे में 51 बीघा जमीन दे दी. ये इंग्लिश गांव उसी जमीन पर बसा है. 51 बीघा में से 25 बीघा में लोगों के घर बसे हैं और बाकी के 25 बीघा में खेत और सड़कें हैं. सुदामा सिंह ने बताया कि फली सिंह के चार बेटे थे, जिनमें से तीन बेटों के परिवार ने पूरा इंग्लिश गांव बसाया है. इसे राजपूतों का गांव भी कहते हैं. सुदामा सिंह ने कहा कि फली सिंह को राय का दर्जा अंग्रेजों ने ही दिया था.
क्यों खास है ये गांव?
गांव की बसावट भी बाकी गांवों से अलग मानी जाती है. यहां परिवार की अलग-अलग पीढ़ियों के घर एक-दूसरे के करीब मौजूद हैं. इससे सामाजिक एकजुटता बनी रहती है और किसी भी सुख-दुख के मौके पर पूरा गांव एक परिवार की तरह साथ खड़ा दिखाई देता है. ग्रामीणों का कहना है कि यही एकता गांव की सबसे बड़ी पूंजी है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, गांव में खेती प्रमुख आजीविका का साधन है. ज्यादातर परिवार खेती-बाड़ी से जुड़े हुए हैं और परंपरागत खेती के साथ आधुनिक तकनीकों को भी अपनाने की कोशिश कर रहे हैं. नई पीढ़ी शिक्षा और रोजगार के लिए शहरों की ओर जा रही है, लेकिन अपने गांव और पारिवारिक जड़ों से उनका जुड़ाव आज भी बना हुआ है.
ये भी पढ़ें: बिहार में दाखिल-खारिज को लेकर सम्राट चौधरी सरकार का बड़ा फैसला, जानिए खेत मालिकों पर क्या पड़ेगा असर?