अभी कुछ ही दिन बीते हैं जब 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में हमारे एथलीट्स ने शानदार प्रदर्शन कर पूरे देश का सीना चौड़ा कर दिया था. जब हमारे चैंपियन वतन लौटे थे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस गर्मजोशी से उनसे मुलाकात की वो तस्वीरें आज भी जेहन में ताजा हैं. उस पल को देखकर फिर इस बात का अहसास हुआ था कि हां, अब हम बदल रहे हैं.
हमारे खेलों का स्तर सुधर रहा है लेकिन, क्या हकीकत सिर्फ इन तस्वीरों तक ही सीमित है? दरअसल आज जब एक अंग्रेज़ी अखबार में एक रिपोर्ट पढ़ी जहां दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में एक महंगी जैवलिन ट्रेनिंग मशीन के लावारिस पड़े होने की बात छपी थी तो दिल टूट गया. मानो सारी उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आया. यह खबर सिर्फ एक ट्रेनिंग मशीन के खराब होने की नहीं थी. मेरी राय में यह उस प्रशासनिक सुस्ती की कहानी थी जो हमारे एथलीट्स के सपनों को जंग लगा रही है.
बदलते भारत की खेल भावना से लापरवाही
पिछले कुछ सालों में, भारत ने खेलों के दुनिया में एक नई करवट ली है या कहूं एक नई क्रांति की शुरूआत की है. अब खेल सिर्फ एक शौक नहीं बल्कि देश के सम्मान का प्रतीक बन गए हैं. हालांकि ऐसा पहले भी होता था लेकिन खासतौर से 2014 के बाद से, जब भी किसी भारतीय ने विदेशी धरती पर मेडल जीता प्रधानमंत्री मोदी ने खुद आगे बढ़कर उनका हौसला बढ़ाया है. खेलो इंडिया जैसे अभियानों ने गांव-गांव से प्रतिभाओं को ढूंढा है. लगभग हर साल ही सरकार ने खेल बजट भी बढ़ाया है.
ना जाने कितने एथलीट्स को विदेशों में ट्रेनिंग के मौके दिए हैं और सुविधाओं में कभी कोई कंजूसी नहीं की. छोटे-छोटे कस्बों से निकलकर जब कोई चैंपियन बनता है तो पूरा देश उसके साथ खड़ा होता है. यह एक ऐसा दौर है जहां उम्मीदें बहुत ऊंची हैं. लेकिन जब हम इस तरह की प्रशासनिक लापरवाही देखते हैं तो दिल बैठ जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक ‘मेक इन इंडिया’ के तहत 15 लाख रुपये की लागत से खरीदी गई वो मशीन जो हमारे जैवलिन थ्रो के खिलाड़ियों की ताकत और तकनीक को निखारने के लिए थी बारिश और धूल की मार झेलती दिखी. हैरानी है कि महीनों से उसे स्टेडियम में इंस्टॉल करने के लिए एक सही जगह तक नहीं खोजी जा सकी.
क्या ऐसे बनेंगे हम खेलों की महाशक्ति?
सैकड़ों-हज़ारों करोड़ के खेल बजट में अगर 15 लाख की मशीन खराब हो जाती है तो शायद इसे इतना बड़ा ना माना जाए. लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है, क्योंकि मशीन खरीदने से पहले यकीनन ये भी सोचा गया होगा कि उसे लगाया कहां जाएगा. फिर भला मशीन के आने के बाद ये लापरवाही कैसे अनदेखी होती रही. जैवलिन थ्रो की ये मशीन उसी तकनीक पर आधारित थी जिसका इस्तेमाल दुनिया के दिग्गज थ्रोअर्स करते हैं. सोचकर ही अफसोस होता है कि जो मशीन हमारे खिलाड़ियों को मेडल जिताने में मदद कर सकती थी, वह बिना किसी कारण बस कबाड़ बन रही है.
बताने की ज़रूरत नहीं कि हम 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स और 2036 के ओलंपिक खेलों की मेजबानी का सपना देख रहे हैं. हम चाहते हैं कि दुनिया हमें खेलों की एक महाशक्ति के रूप में पहचाने. लेकिन महाशक्ति सिर्फ बड़े स्टेडियम बनाने या दावे करने से नहीं बना जाता. इसके लिए हर स्तर पर जिम्मेदारी और जवाबदेही की जरूरत होती है. अगर हम राजधानी में पड़े एक जरूरी उपकरण की देखभाल नहीं कर सकते, तो इतने बड़े आयोजनों को कैसे सफलतापूर्वक संभालेंगे? यह घटना हमारे पूरे खेल सिस्टम पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है.
सुविधाओं का अभाव और खिलाड़ियों का संघर्ष
भारत ने 1951 और 1982 में एशियन गेम्स की मेज़बानी की थी. जिसके बाद 2010 में दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन हुआ. हर आयोजन के लिए देश में खेल और खिलाड़ियों से जुड़ी सुविधाओं और व्यवस्थाओं को तैयार करने में दिल खोलकर खर्च भी किया गया. ज्यादा पीछे जाना तो सही नहीं होगा, लेकिन 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन में हुए करोड़ों रूपयों के घोटालों की खबरें आज भी देश के करोड़ों लोग भुला नहीं पाए हैं.
बहरहाल, मुद्दे की बड़ी बात आज भी ये है कि हमारे ज्यादातर एथलीट्स वैसे ही कई तरह की मुश्किलों से जूझते हुए आगे बढ़ते हैं. उनके पास विदेशी खिलाड़ियों जैसी वर्ल्ड क्लास सुविधाएं नहीं होतीं. ऐसे में जब कोई अच्छी मशीन या उपकरण आता है तो वो उनके लिए किसी संजीवनी से कम नहीं होता. फिर अगर वो सुविधा आंखों के सामने पड़ी-पड़ी खराब हो रही हो और खिलाड़ी उसका इस्तेमाल न कर सकें तो उनकी मानसिक स्थिति क्या होगी? मेरी राय में यह सिर्फ पैसे की बर्बादी नहीं है ये उन खिलाड़ियों के समय और भविष्य की बर्बादी है जो देश के लिए पसीना बहा रहे हैं.
अब है जवाबदेही तय करने का वक्त
इस रिपोर्ट ने लापरवाह सिस्टम की कलई खोल दी है. ये साफ है कि खेल प्रशासन से जुड़े कुछ लोग अपनी जिम्मेदारियों को लेकर गंभीर नहीं हैं. मशीन खरीदने का बजट तो पास हो गया लेकिन उसे लगाने की जगह और रखरखाव का कोई प्लान नहीं था. यकीन है कि ये खबर आज नहीं तो कल खेल मंत्री मनसुख मंडाविया और प्रधानमंत्री मोदी तक जरूर पहुंचेगी. और जब पहुंचेगी तो इस पर शांत नहीं बैठा जाएगा.
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जिन लोगों की लापरवाही से यह हुआ है उन पर सख्त एक्शन होना ही चाहिए. अगर हमें सच में खेलों में विश्व स्तर पर अपना दबदबा बनाना है तो ऐसी घटनाओं को रोकना होगा. हमें एक ऐसा सिस्टम बनाना होगा जहां हर फैसले की पूरी जिम्मेदारी तय हो. लाल फीताशाही और लापरवाही के लिए खेलों में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. हमें अपने खिलाड़ियों को यह अहसास कराना होगा कि देश और सिस्टम पूरी तरह से उनके साथ है न कि उनके रास्ते का रोड़ा.
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बदलते देश की उम्मीदों में भरोसे का सच
आखिर में यही कहूंगा कि बात सिर्फ एक मशीन की नहीं है. बात उन उम्मीदों की है जो हम हर उस युवा एथलीट से लगाते हैं जो देश के लिए जीत का परचम फहराने की उम्मीदों के साथ मैदान में उतरता है. जब वो दौड़ता है तो उसके साथ 145 करोड़ भारतीयों के सपने दौड़ते हैं. इन सपनों को प्रशासनिक जंग लगने से बचाना होगा. अगर सरकार ये सुनिश्चित कर रही है कि हर खिलाड़ी को वो सुविधा मिले जिसका वो हकदार है. तो हम भारतीयों को अपने हर खिलाड़ी पर भरोसा रखना सीखना होगा.
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यही भरोसा हमें उम्मीद देगा कि ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स में जीते 39 मेडल्स, 2010 दिल्ली गेम्स की ही तरह 100 का आंकड़ा पार करेंगे. अतिथि देवो भव: के जज्बे के साथ हम भारतीय 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स और 2036 ओलंपिक गेन्स की शान से मेज़बानी करेंगे. दुनिया का स्वागत कर पाएंगे और हमारे खिलाड़ी पोडियम पर खड़े होकर गर्व से तिरंगा लहराते हुए नजर आएंगे.
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