टीम इंडिया आगामी 15 अगस्त से गॉल के मैदान पर श्रीलंका के खिलाफ जब उतरेगी, तो दांव पर सिर्फ एक सीरीज नहीं होगी. मैं तो कहूंगा कि यह सीरीज टीम इंडिया से ज्यादा हेड कोच गौतम गंभीर के भविष्य और उनकी कोचिंग का एक बहुत बड़ा लिटमस टेस्ट होने वाली है. वैसे तो शुभमन गिल की कप्तानी वाली टीम इंडिया की पूरी कोशिश होगी कि श्रीलंका को उसी के घर पर क्लीन स्वीप किया जा सके. इसी कड़ी में कुछ हालिया रिपोर्ट्स को अगर सच माना जाए तो भारतीय टीम श्रीलंका के माहौल और वहां की उमस भरी कंडीशंस में जल्दी ढलने के लिए 4 अगस्त को ही रवाना हो जाएगी.
टीम को अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए चार दिनों का एक जरूरी वॉर्म-अप मैच भी खेलना है. बाहर से देखने पर यह सब क्रिकेट के आम शेड्यूल का हिस्सा लग सकता है, लेकिन ड्रेसिंग रूम का अंदरूनी माहौल बता रहा है कि कोच के तौर पर गंभीर इस वक्त भारी दबाव से गुजर रहे हैं. घर पर साउथ अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट सीरीज में मिली उस शर्मनाक हार के बाद से ही भारतीय फैंस के दिलों में निराशा है. उस हार ने WTC फाइनल की राह को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है. ऐसे में श्रीलंका का यह दौरा गंभीर के लिए साख बचाने और खुद को साबित करने की आर-पार की लड़ाई बन चुका है.
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दिग्गजों की विदाई और विकल्पों की 'अंतहीन' तलाश
एक वक्त था जब भारतीय टेस्ट टीम का मतलब ही अनुभव, संयम और मैदान पर एक अलग तरह की स्थिरता हुआ करता था. लेकिन गौतम गंभीर के बतौर कोच कार्यकाल में क्रिकेट के इस सबसे पुराने फॉर्मेट में काफी कुछ बदल गया है. वो खूबसूरत दौर अब पीछे छूटता जा रहा है जब क्रीज पर हमारे दिग्गज बल्लेबाज खूंटा गाड़ कर खड़े हो जाते थे. अलग-अलग हालातों के चलते रोहित शर्मा, विराट कोहली और आर अश्विन जैसे मैच विनर और चैंपियन खिलाड़ियों ने टेस्ट फॉर्मेट से विदाई ले ली है. चेतेश्वर पुजारा भी टेस्ट से रिटायर हो चुके खिलाड़ियों की फेहरिस्त में हैं.
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इन महान खिलाड़ियों को सफेद जर्सी छोड़े अब ठीक-ठाक वक्त बीत चुका है, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि टीम मैनेजमेंट आज भी इनका सही रिप्लेसमेंट ढूंढने की फिराक में ही नजर आता है. ये सच है कि किसी भी बड़े खिलाड़ी की जगह लेना कभी आसान नहीं होता. लेकिन बदलाव के इस दौर में टीम का जो असंतुलित हाल दिख रहा है, वह हर क्रिकेट प्रेमी के मन में एक गहरी बेचैनी पैदा कर चुका है. इक्का-दुक्का खिलाड़ियों को छोड़ दिया जाए तो नए चेहरों में वो ठहराव और जिम्मेदारी का अहसास नजर ही नहीं आता. ऐसा लगता है मानो हमारी टीम का मिडिल ऑर्डर अब भी पुराने दिग्गजों की शानदार यादों के सहारे ही आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है.
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स्पिन के सामने भारतीय बल्लेबाज़ी की पहेली
अगर भारतीय क्रिकेट के सुनहरे इतिहास को पलट कर देखें तो कभी स्पिन गेंदबाजी को खेलना हमारे बल्लेबाजों के खून में माना जाता था. दुनिया भर के दिग्गज और खतरनाक स्पिनर्स भी फिरकी की मददगार भारतीय पिचों पर आने से घबराते थे. वजह यही थी कि हमारे बल्लेबाज अपने फुटवर्क और स्पिन खेलने की तकनीक से उनकी लय बिगाड़ देते थे. लेकिन आज के दौर में कहानी उल्टी हो चुकी है. पिछले दो-तीन सालों के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि हमारे अपने टॉप ऑर्डर के दिग्गज बल्लेबाज विदेशी और घरेलू फिरकी के फंदे में बुरी तरह नाचते नजर आते हैं.
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श्रीलंका की पिचें हमेशा से स्पिनरों की जन्नत रही हैं और वहां की टर्निंग पिचों पर श्रीलंकाई स्पिनर्स हमारी नई बैटिंग लाइन-अप का कड़ा इम्तिहान लेने के लिए बेताब बैठे हैं. वहां प्रभात जयसूर्या से लेकर रमेश मेंडिस और दूसरे लंकाई स्पिनरों को उन्हीं के घर पर खेलना भारतीय बल्लेबाज़ों के लिए आसान नहीं होगा. फिर अगर सीरीज़ का नतीजा भारत के पक्ष में नहीं आता है तो गौतम गंभीर के लिए हालात संभालना नामुमकिन हो जाएगा. ऐसा होने पर उनकी बतौर टेस्ट कोच काबिलियत पर सीधे सवाल उठ जाएंगे.
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चोट का ग्रहण और 100% फिटनेस का इंतजार
किसी भी सीरीज को जीतने के लिए पहले तो सही टीम और फिर मैच में सही प्लेइंग-11 का चयन अहम कदम होता है. लेकिन इस वक्त टीम सिलेक्शन ही मैनेजमेंट का सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है. सेलेक्टर्स इस असमंजस में हैं कि श्रीलंका की कंडीशंस के हिसाब से सबसे सटीक कॉम्बिनेशन क्या होना चाहिए. एक उलझन वाशिंगटन सुंदर को लेकर है जो वनडे सीरीज के दौरान हैमस्ट्रिंग की चोट का शिकार हो गए थे. रिपोर्ट्स बताती हैं कि अगर यह सिर्फ मांसपेशियों में खिंचाव या ग्रेड-1 की चोट भी हुई तो भी उन्हें पूरी तरह मैच फिट होने में कुछ और वक्त लग सकता है.
ऐसे में अजीत अगरकर की अगुवाई वाली सिलेक्शन कमेटी उनकी मेडिकल रिपोर्ट का बेसब्री से इंतजार कर रही है. अगर सुंदर समय पर फिट नहीं होते देखना दिलचस्प होगा कि टीम इंडिया में उनका रिप्लेसमेंट कौन बनता है. अनुभवी रवींद्र जडेजा का प्लेइंग-11 में खेलना तय है, वहीं मानव सुथार और कुलदीप यादव भी टीम में बने रहेंगे. लेकिन श्रीलंका सीरीज़ की टीम सिलेक्शन करते वक्त एक अतिरिक्त स्पिनर को सिलेक्टर ज़रूर चुनेंगे. सुंदर की गैरमौजूदगी पूरे गेंदबाजी समीकरण को उलझा सकती है. देखना होगा कि क्या हर्ष दुबे को टीम में बरकरार रखा जाता है या फिर स्पिन अटैक में वैरायटी लाने के लिए सारांश जैन जैसे युवा ऑफ-स्पिनर को आजमाया जाता है.
बुमराह-जडेजा पर होगा गेंदबाजी का दारोमदार
इस भारी दबाव और उलझनों भरे माहौल में टीम इंडिया के लिए राहत की इकलौती किरण जसप्रीत बुमराह और रवींद्र जडेजा की वापसी है. इन दोनों वर्ल्ड क्लास मैच विनर्स का टीम में लौटना यकीनन हमारे गेंदबाजी आक्रमण को एक नई और खतरनाक धार देगा. पिछले महीने अफगानिस्तान के खिलाफ खेले गए इकलौते टेस्ट मैच में जडेजा को आराम दिया गया था, लेकिन वो आज भी इस फॉर्मेट के नंबर वन स्पिन ऑलराउंडर हैं.
तेज गेंदबाजी की बात करें तो बुमराह के साथ मोहम्मद सिराज, गुरनूर बरार और प्रसिद्ध कृष्णा एक्शन में नजर आ सकते हैं. बुमराह की यॉर्कर और सिराज की स्विंग श्रीलंका के बल्लेबाजों को परेशानी में डालने का पूरा दम रखती है. इन अनुभवी गेंदबाजों के टीम में वापस आने से कप्तान शुभमन गिल को मैदान पर फैसले लेने में काफी आसानी होगी और टीम का मनोबल भी ऊंचा रहेगा.
पक्षपात के आरोप और शमी-ईश्वरन की लगातार अनदेखी
टीम सिलेक्शन हमेशा से ही भारतीय क्रिकेट में तीखी बहस और विवादों का हिस्सा रहा है. अक्सर सिलेक्टर्स पर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं और श्रीलंका दौरे से पहले भी हालात कुछ अलग नहीं हैं. घरेलू क्रिकेट में अपनी फिटनेस और शानदार लय साबित करने के बावजूद दिग्गज तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी की टीम में वापसी को लेकर सिलेक्टर्स एकमत नहीं दिख रहे हैं. शमी का अनुभव ऐसे अहम मौकों पर टीम के बहुत काम आ सकता है.
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दूसरी तरफ, बल्लेबाजों की फेहरिस्त में अभिमन्यु ईश्वरन जैसे टैलेंटेड और लगातार रन बनाने वाले खिलाड़ी को चाहे-अनचाहे तौर पर नजरअंदाज किया जा रहा है. जब घरेलू क्रिकेट में पसीना बहाने वाले असली टैलेंट को बार-बार दरकिनार किया जाता है, तो फैंस का दिल टूटना लाजमी है. तमाम आरोपों और आलोचनाओं के बीच एक संतुलित, निष्पक्ष और मैच जिताऊ टीम चुनना गंभीर और चीफ सिलेक्टर के लिए एक बहुत बड़ी मानसिक चुनौती रहेगा.
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WTC फाइनल की रेस और आगे का बेहद कठिन रास्ता
हम सभी जानते हैं कि श्रीलंका की टेस्ट सीरीज सिर्फ एक सामान्य जीत या हार तक सीमित नहीं होगी. इसका सीधा और गहरा असर वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के पॉइंट्स टेबल पर पड़ने वाला है. भारत को अगर अपनी उम्मीदों को जिंदा रखना है और फाइनल का टिकट कटाना है तो जीत ज़रूरी है. असल चिंता की बात यह है कि लंका दौरे के बाद भारतीय क्रिकेट टीम का सफर और भी ज्यादा मुश्किल होने वाला है.
इसके बाद हमें न्यूजीलैंड के खिलाफ उन्हीं के घर पर तेज और उछाल भरी पिचों पर खेलना है. और फिर अपने WTC साइकिल की सबसे बड़ी और आखिरी चुनौती यानी बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के लिए अपनी घरेलू सरजमीं पर मजबूत ऑस्ट्रेलिया से पांच टेस्ट मैचों की लंबी सीरीज खेलनी है. अगर श्रीलंका में टीम इंडिया का आत्मविश्वास जरा भी डगमगाया, तो कीवी और कंगारू टीमों के खिलाफ हमारी मुश्किलें पहाड़ जैसी हो जाएंगी. इसलिए इस सीरीज को किसी भी हाल में हलके में नहीं लिया जा सकता.
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पुरानी हार, कुर्सी का सवाल और आखिरी उम्मीद
गौतम गंभीर और श्रीलंका का कनेक्शन क्रिकेट के पन्नों में काफी दिलचस्प और उतार-चढ़ाव भरा रहा है. आपको याद नहीं हो तो बता दूं कि करीब 2 साल पहले जब गंभीर ने कोचिंग की दुनिया में अपने सफर की शुरुआत की थी तो उनका पहला असाइनमेंट श्रीलंकाई धरती पर ही था. उस वक्त व्हाइट बॉल सीरीज में भारत को श्रीलंका के हाथों एक बेहद शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था. अब किस्मत उन्हें एक बार फिर उसी मोड़ पर ले आई है. श्रीलंका में अभी नहीं तो कभी नहीं… की तर्ज पर गंभीर को अपनी रणनीतियों का लोहा हर हाल में मनवाना होगा.
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वो हमेशा से अपने आक्रामक रवैये और निडर फैसलों के लिए जाने जाते हैं. लेकिन इस बार उनकी कुर्सी पर जो सवाल उठ रहे हैं, उन्हें शांत करने के लिए सिर्फ बातों से बात नहीं बनेगी और ठोस नतीजे देने होंगे. माना जा रहा है कि रविवार 26 अगस्त तक सिलेक्टर्स श्रीलंका दौरे के लिए टीम का पूरी तरह से चयन कर लेंगे. क्रिकेट का खेल अनिश्चितताओं से भरा होता है, लेकिन उम्मीद है कि गंभीर के नेतृत्व में नई टीम इंडिया अपनी पुरानी गलतियों से सीखेगी और जीत की पटरी पर लौट कर देशवासियों को एक बार फिर मुस्कुराने का मौका देगी.
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