दशकों तक आधुनिक चिकित्सा और जेनेटिक साइंस ने मानवता का अध्ययन एक ऐसे नजरिए से किया, जिसमें भारतीय आबादी की भूमिका न के बराबर थी. दुनिया के बड़े डीएनए डेटाबेस मुख्य रूप से यूरोपीय आबादी पर आधारित थे, जिसके कारण दवाओं के शोध और बीमारियों के मॉडल भारतीयों की सटीक जेनेटिक संरचना से मेल नहीं खाते थे. लेकिन भारत के एक टॉप वैज्ञानिक ने इस असमानता को चुनौती देकर इतिहास बदल दिया.
इस वर्ष भारत सरकार ने देश के प्रतिष्ठित आनुवंशिकीविद् (जेनेटिकिस्ट) डॉ. कुमारसामी थंगराज को पद्म श्री से सम्मानित किया है. हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (CDFD) के पूर्व निदेशक डॉ. थंगराज की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि उन्होंने अपनी पूरी शिक्षा और वैज्ञानिक करियर भारत में ही पूरा किया.
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अंडमान की जनजातियों में छुपा है मानव इतिहास का रहस्य
साल 2005 में डॉ. थंगराज और उनकी टीम ने जर्नल 'साइंस' में एक ऐतिहासिक रिसर्च पब्लिश किया था. उन्होंने अंडमान की ओंगे और जारावा जैसी स्वदेशी जनजातियों के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए का विश्लेषण किया. इस शोध में सामने आया कि ये समुदाय अफ्रीका से बाहर जाने वाले आधुनिक मनुष्यों के सबसे शुरुआती समूहों में से थे, जिन्होंने लगभग 65,000 वर्ष पहले दक्षिण तटीय मार्ग से यात्रा शुरू की थी.
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ऐतिहासिक दावों का सत्यापन
यह खोज इस बात का पुख्ता सबूत बनी कि दुनिया भर की आबादी में भले ही बार-बार प्रवासन और अंतर्विवाह के कारण बदलाव आए हों, लेकिन अंडमान के इन समुदायों ने अफ्रीका के बाहर मानवता की सबसे पुरानी जीवित आनुवंशिक विरासत को सुरक्षित रखा है. डॉ. थंगराज के इसी दृष्टिकोण को अब 'जीनोमइंडिया प्रोजेक्ट' के हालिया आंकड़ों से नई मजबूती मिल रही है. इस परियोजना के तहत भारत के विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के 9,768 व्यक्तियों के जीनोम की सीक्वेंसिंग की गई.
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मेडिकल इंडस्ट्री में आ सकता है क्रांतिकारी बदलाव
शोधकर्ताओं ने कुल 13 करोड़ जेनेटिक वेरिएंट की पहचान की. इनमें से 4.4 करोड़ से अधिक वेरिएंट वैश्विक डेटाबेस से पूरी तरह गायब थे. यह डेटा साबित करता है कि वैश्विक चिकित्सा विज्ञान अब तक दुनिया की एक-छठवीं आबादी के आनुवंशिक इतिहास को नजरअंदाज कर रहा था. भारतीय आबादी की यह खासियत भविष्य में व्यक्तिगत उपचार, बीमारी का सटीक इलाज और नई दवाओं के विकास में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है.