Global Warming: IGCC Report 2025 ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक काल से पहले के मुकाबले 1.39 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है. इसमें सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 1.37 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी सीधे इंसानी गतिविधियों की वजह से हुई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अब जलवायु परिवर्तन केवल प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि इंसानों के कारण यह संकट और तेजी से गहरा रहा है. विशेषज्ञों ने इसे धरती के लिए रेड अलर्ट जैसा संकेत बताया है.
ग्रीनहाउस गैसों का रिकॉर्ड स्तर और खत्म होता कार्बन बजट
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 56.8 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड इक्विवेलेंट तक पहुंच गया है. यह अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो अगले तीन साल के भीतर दुनिया का कार्बन बजट खत्म हो सकता है. इसके बाद ग्लोबल तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के अंदर रोक पाना लगभग असंभव हो जाएगा. यही कारण है कि विशेषज्ञ सभी देशों को तुरंत प्रदूषण कम करने और स्वच्छ ऊर्जा अपनाने की सलाह दे रहे हैं.
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लगातार टूट रहे गर्मी के रिकॉर्ड
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2025 दुनिया का तीसरा सबसे गर्म साल रहा. इससे पहले 2024 और 2023 ने तापमान के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए थे. खास बात यह है कि 2025 में ला नीना प्रभाव मौजूद था, जो सामान्य तौर पर तापमान कम करने में मदद करता है. इसके बावजूद धरती का तापमान खतरनाक स्तर पर बना रहा. वैज्ञानिकों के अनुसार यह साफ संकेत है कि इंसानी गतिविधियों का असर अब प्राकृतिक जलवायु तंत्र से भी ज्यादा मजबूत हो चुका है. कोयला, पेट्रोलियम और गैस जैसे ईंधनों का अत्यधिक उपयोग इस संकट की सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है.
भविष्य को लेकर वैज्ञानिकों की बड़ी चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि दुनिया ने समय रहते कदम नहीं उठाए तो आने वाले वर्षों में सूखा, बाढ़, जंगलों की आग, समुद्री तूफान और हीटवेव जैसी आपदाएं और ज्यादा खतरनाक हो जाएंगी. रिपोर्ट के अनुसार 2026 की शुरुआत से दुनिया केवल 130 अरब टन अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड ही उत्सर्जित कर सकती है. इसके बाद 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा स्थायी रूप से पार हो सकती है. विश्व मौसम संगठन ने भी चेतावनी दी है कि अगले पांच वर्षों में कम से कम एक साल ऐसा हो सकता है जब यह सीमा पार हो जाए. वैज्ञानिकों का मानना है कि अब केवल चेतावनी देने का समय नहीं बल्कि तेजी से कार्रवाई करने का समय है ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती को सुरक्षित रखा जा सके.
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