Science News in Hindi: अंतरिक्ष में पृथ्वी के चारों ओर घूम रहा कचरा यानी 'स्पेस जंक' लंबे समय से दुनिया भर की स्पेस एजेंसियों के लिए सिरदर्द बना हुआ है. अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर और तिरुवनंतपुरम के वैज्ञानिकों ने एक बड़ा खुलासा किया है. वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया है कि सूरज की बढ़ती सक्रियता पृथ्वी के चारों ओर मंडरा रहे पुराने उपग्रहों और रॉकेट के मलबे को तेजी से नीचे खींच रही है. 36 साल के पुराने आंकड़ों के विश्लेषण के बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने इस पहली को सुलझा दिया है कि आखिर क्यों अंतरिक्ष का मलबा अचानक तेजी से पृथ्वी की ओर गिरने लगता है. यह शोध भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

कैसे काम करता है सूरज का यह 'अदृश्य हाथ'?

वैज्ञानिकों के मुताबिक सूर्य का अपना एक 11 साल का प्राकृतिक चक्र होता है. जब सूर्य इस चक्र के चरम यानी 'सोलर मैक्सिमम' पर पहुंचता है और सनस्पॉट्स की संख्या 67 फीसदी के पार हो जाती है, तब वह भारी मात्रा में पराबैंगनी (यूवी) विकिरण और ऊर्जा कण छोड़ता है. इससे पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल जिसे 'थर्मोस्फीयर' कहते हैं, उसका तापमान बढ़ जाता है और वह फैलने लगता है. वायुमंडल के फैलने से ऊपरी कक्षा में हवा का घनत्व बढ़ जाता है जो अंतरिक्ष मलबे के लिए 'घर्षण' (ड्रैग) पैदा करता है. यह घर्षण 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से घूम रहे मलबे की गति को धीमा कर देता है, जिससे वह अपनी कक्षा छोड़कर तेजी से नीचे गिरने लगता है.

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लो अर्थ ऑर्बिट में टकराव का बढ़ता खतरा

यह अध्ययन इसलिए भी अहम है क्योंकि ज्यादातर मौसम, संचार और इंटरनेट उपग्रह 'लो अर्थ ऑर्बिट' (LEO) में ही काम करते हैं. वैज्ञानिकों ने 600 से 800 किलोमीटर की ऊंचाई पर घूम रही 17 निष्क्रिय वस्तुओं को ट्रैक किया और पाया कि सूरज की सक्रियता बढ़ने पर उनकी ऊंचाई तेजी से घटने लगती है. अंतरिक्ष में कचरा बढ़ने से 'डोमिनो इफेक्ट' का खतरा बना रहता है, जहां मलबे का एक छोटा टुकड़ा भी किसी सक्रिय उपग्रह को नष्ट कर सकता है. इससे और अधिक मलबा पैदा होता है जो अन्य उपग्रहों के लिए भी खतरा बन जाता है. भारतीय वैज्ञानिकों की यह खोज यह समझने में मदद करेगी कि कब उपग्रहों को टकराव से बचाने के लिए अधिक ईंधन और कक्षा सुधार की जरूरत होगी.

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भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए नई उम्मीद

इस शोध की प्रमुख वैज्ञानिक आयशा अशरफ के अनुसार यह पहली बार है जब सूर्य की गतिविधि और मलबे के नीचे गिरने के बीच इतना स्पष्ट संबंध देखा गया है. दिलचस्प बात यह है कि 1960 के दशक में छोड़े गए पुराने निष्क्रिय उपग्रह आज भी वैज्ञानिकों को सूर्य और पृथ्वी के जटिल संबंधों को समझने में मदद कर रहे हैं. इस नई जानकारी से अब अंतरिक्ष एजेंसियां बेहतर तरीके से योजना बना सकेंगी कि कब अंतरिक्ष का मलबा स्वाभाविक रूप से कम हो सकता है और कब बड़े हादसों का खतरा ज्यादा है. यह खोज न केवल उपग्रहों को सुरक्षित रखेगी बल्कि अंतरिक्ष में बढ़ते प्रदूषण को कम करने की दिशा में भी एक मील का पत्थर साबित होगी.

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