Science News in Hindi: भारतीय मूल के शोधकर्ता डॉक्टर कुमार मृत्युंजय और उनकी टीम ने एक ऐसा क्रांतिकारी थ्री-डी सिस्टम विकसित किया है जो तकनीक की दुनिया को पूरी तरह बदल सकता है. इस नई खोज के जरिए अब जीवित न्यूरॉन्स को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के साथ सीधे जोड़ा जा सकेगा जो पहले कभी मुमकिन नहीं था. यह रिसर्च ‘नेचर इलेक्ट्रॉनिक्स’ जर्नल में प्रकाशित हुई है जिसने बुद्धिमत्ता और दिमाग के व्यवहार को समझने की दिशा में एक नया रास्ता खोल दिया है. डॉक्टर मृत्युंजय ने आईआईटी खड़गपुर से अपनी पढ़ाई पूरी की है और उनके नेतृत्व में बना यह उपकरण जीवित ब्रेन सेल्स को एक इलेक्ट्रॉनिक ढांचे के भीतर बढ़ने और संवाद करने में मदद करता है.
न्यूरॉन्स के लिए तैयार किया गया खास 3D प्लेटफॉर्म
अभी तक इस्तेमाल होने वाले ‘ब्रेन-ऑन-चिप’ सिस्टम ज्यादातर फ्लैट या समतल होते थे जिससे उनकी क्षमता काफी सीमित रहती थी. लेकिन इस नए 3D चिप में न्यूरॉन्स को कई दिशाओं में बढ़ने की जगह मिलती है जो बिल्कुल इंसानी दिमाग की प्राकृतिक बनावट जैसा महसूस होता है. इस डिवाइस में छोटे-छोटे सेंसर्स लगाए गए हैं जो न केवल न्यूरॉन्स के सिग्नल को रिकॉर्ड कर सकते हैं बल्कि उन्हें उत्तेजित भी कर सकते हैं. इसका मतलब है कि अब जीवित ऊतकों और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के बीच दोनों तरफ से संवाद हो सकेगा जो भविष्य के हाइब्रिड सिस्टम के लिए बहुत जरूरी है.
सीखने और याद रखने की क्षमता
इस रिसर्च की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह डिवाइस लंबे समय तक न्यूरल एक्टिविटी को स्थिर बनाए रख सकता है. वैज्ञानिकों के अनुसार महीनों तक चलने वाली इस प्रक्रिया से यह समझने में मदद मिलेगी कि वक्त के साथ दिमाग के कनेक्शन कैसे मजबूत या कमजोर होते हैं. यह जानकारी सीखने और याददाश्त की प्रक्रिया को गहराई से समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. यह उपकरण प्रोग्राम करने योग्य भी है जिससे शोधकर्ता न्यूरल नेटवर्क के व्यवहार को कंट्रोल कर सकेंगे. इससे अब केवल डिजिटल एल्गोरिदम ही नहीं बल्कि असली न्यूरॉन्स के जरिए सीखने की प्रक्रिया को समझा जा सकेगा.
भारतीय वैज्ञानिकों का दबदबा
डॉक्टर मृत्युंजय की यह कामयाबी वैश्विक विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय शोधकर्ताओं के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की जांच में तेजी लाएगी और ब्रेन-मशीन इंटरफेस को और बेहतर बनाएगी. हालांकि यह प्लेटफॉर्म अभी रिसर्च फेज में है लेकिन यह उन मशीनों की ओर इशारा करता है जो इंसानी दिमाग की तरह सोचने में सक्षम होंगी. आने वाले समय में बायोलॉजी और तकनीक के बीच का अंतर पूरी तरह खत्म हो सकता है जिससे बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग की पूरी परिभाषा ही बदल जाएगी.
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