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Margshirsh Purnima: साल 2025 की आखिरी पूर्णिमा कब है, क्यों महत्वपूर्ण है? जानें सही तारीख और पूजा विधि

Margshirsh Purnima: मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2025 साल की अंतिम और अत्यंत शुभ पूर्णिमा है, जो आध्यात्मिक उर्जा, दान-पुण्य और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का सर्वोत्तम अवसर मानी जाती है. आइए जानते हैं, आखिर यह तिथि इतनी पावन क्यों मानी गई है, 2025 में कब पड़ रही है और इसकी सही पूजा-विधि क्या है?

Margshirsh Purnima: मार्गशीर्ष पूर्णिमा हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और शुभ तिथि मानी जाती है. साल 2025 की यह पूर्णिमा इसलिए भी खास है क्योंकि यह वर्ष की आखिरी पूर्णिमा है. दिसंबर महीने में पड़ने वाली यह तिथि आध्यात्मिक ऊर्जा, दान-पुण्य और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का उत्तम समय मानी जाती है. इस दिन किए गए साधना, व्रत और पूजा से मन को शांति मिलती है और जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है. आइए जानते हैं, क्यों खास है मार्गशीर्ष पूर्णिमा, यह कब है, इसका महत्व क्या है और स्टेप बाय स्टेप पूजा विधि क्या है?

क्यों खास है मार्गशीर्ष पूर्णिमा?

मार्गशीर्ष का महीना स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है. गीता में वे कहते हैं—“महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ.” इसलिए इस माह की पूर्णिमा को मोक्षदायिनी पूर्णिमा भी कहा जाता है. इस दिन की गई पूजा आत्मिक उन्नति, सौभाग्य और मनोवांछित परिणाम देने वाली मानी जाती है. भक्त इस दिन स्नान, ध्यान, दान और सत्यनारायण भगवान की कथा के माध्यम से दिव्यता का अनुभव करते हैं.

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मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2025 कब है?

चूंकि मार्गशीर्ष पूर्णिमा अंग्रेजी वर्ष के अंतिम माह में आती है, इसलिए इसे साल 2025 की आखिरी पूर्णिमा कहा जाता है. इस साल मार्गशीर्ष पूर्णिमा का पावन पर्व गुरुवार, 4 दिसम्बर 2025 को मनाया जाएगा. पूर्णिमा तिथि का आरंभ 4 दिसम्बर 2025 की सुबह 08 बजकर 37 मिनट पर होगा. यह पुण्य तिथि अगले दिन यानी 5 दिसम्बर 2025 की सुबह 04 बजकर 43 मिनट पर समाप्त होगी.

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पूर्णिमा के दिन चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने का समय शाम को 04 बजकर 35 मिनट रहेगा. स्नान, दान और व्रत मुख्य रूप से 4 दिसम्बर को ही किया जाएगा, क्योंकि इसी दिन चंद्रोदय हो रहा है और इस तिथि का महत्व उदया तिथि के अनुसार अधिक होता है.

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पूजा का महत्व

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर किए गए सभी पूजा, व्रत और अनुष्ठान मन को शांति देते हैं और जीवन में सकारात्मकता बढ़ाते हैं. इस पूर्णिमा पर भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और चंद्र देव की आराधना करने से जीवन में आनंद, शांति और समृद्धि आती है. तुलसी दल अर्पित करने से विशेष पुण्य मिलता है. शाम के समय सत्यनारायण कथा सुनना या करवाना अत्यंत शुभ माना गया है. यह कथा जीवन में चल रही बाधाओं को दूर करती है और घर में सुख-समृद्धि बढ़ाती है. आइए जानते हैं, मार्गशीर्ष पूर्णिमा की संपूर्ण पूजा विधि.

मार्गशीर्ष पूर्णिमा की पूजा विधि

पवित्र स्नान: इस दिन सूर्योदय से पहले उठें और किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करें. यदि बाहर जाना संभव न हो, तो घर के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें.
व्रत और संकल्प: स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें और हाथ में जल लेकर पूरे दिन व्रत व पूजा करने का संकल्प करें.
पूजा-अर्चना: भगवान विष्णु, सत्यनारायण और चंद्र देव की भक्तिभाव से पूजा करें. भगवान श्रीकृष्ण को तुलसी की पत्तियाँ चढ़ाएं, क्योंकि यह उन्हें अत्यंत प्रिय है.
सत्यनारायण कथा: शाम को परिवार सहित सत्यनारायण भगवान की कथा सुनें या पढ़ें. यह मार्गशीर्ष पूर्णिमा की प्रमुख परंपरा मानी जाती है.
चंद्र देव को अर्घ्य: चंद्रोदय के समय दूध, जल और रोली मिलाकर चंद्र देव को अर्घ्य अर्पित करें. इससे मन की शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है.
दान-पुण्य: इस दिन जरूरतमंद, ब्राह्मण या गरीब व्यक्ति को अन्न, वस्त्र और विशेष रूप से तिल का दान करना अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।


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