Jagannath Rath Yatra Mystery: पुरी की विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा से जुड़ी एक ऐसी परंपरा है, जिसे जानकर बहुत लोग भावुक हो जाते हैं. हर साल जब भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ बड़े दांडा यानी ग्रैंड रोड से गुजरता है, तो वह एक मजार के सामने कुछ देर के लिए रुकता है. पहली नजर में यह बात चौंकाने वाली लग सकती है, लेकिन इसके पीछे सदियों पुरानी भक्ति, प्रेम और आस्था की बेहद खास कहानी छिपी है. यह परंपरा बताती है कि भगवान के लिए सबसे बड़ी चीज जाति, धर्म या पहचान नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा होती है. आइए जानते हैं, पुरी रथयात्रा का यह अनोखा रहस्य कि हर साल एक मजार पर क्यों रुकता है भगवान का रथ, भक्त सालबेग कौन थे और उनका महाप्रभु जगन्नाथ से इतना गहरा रिश्ता कैसे बना?
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कौन थे भक्त सालबेग?
कहते हैं, सालबेग 17वीं सदी के प्रसिद्ध कवि और भगवान जगन्नाथ के अनन्य भक्त थे. उनके पिता मुगल सूबेदार लाल बेग थे, जबकि उनकी मां एक ब्राह्मण महिला थीं. बचपन से ही मां उन्हें भगवान जगन्नाथ की कथाएं सुनाया करती थीं. कहा जाता है कि एक युद्ध के दौरान सालबेग गंभीर रूप से घायल हो गए थे. जब दवाइयों से कोई फायदा नहीं हुआ, तो उनकी मां ने उन्हें भगवान जगन्नाथ का नाम लेने की सलाह दी. मान्यता है कि सच्चे मन से प्रार्थना करने के बाद वे स्वस्थ हो गए. इसी घटना के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान की भक्ति को समर्पित कर दिया.
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जब नहीं मिला मंदिर में प्रवेश
जब सालबेग भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पुरी पहुंचे, तो उस समय उन्हें मुस्लिम होने के कारण मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली. इससे उन्हें गहरा दुख जरूर हुआ, लेकिन उनकी भक्ति जरा भी कम नहीं हुई. उन्होंने तय किया कि जब भगवान रथयात्रा के दौरान मंदिर से बाहर आएंगे, तब वे रास्ते में ही उनके दर्शन करेंगे.
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भगवान ने किया भक्त का इंतजार
एक बार सालबेग जी वृंदावन से पुरी लौट रहे थे, लेकिन रास्ते में बीमार पड़ गए. उन्हें लगा कि इस बार रथयात्रा में भगवान के दर्शन नहीं हो पाएंगे. तब उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि वे उनके आने तक रथ रोक दें. मान्यता है कि जब भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ सालबेग की कुटिया के पास पहुंचा, तो वह अचानक रुक गया. हजारों लोगों, हाथियों और सैनिकों की कोशिश के बाद भी रथ आगे नहीं बढ़ा. बाद में पुजारियों को संकेत मिला कि भगवान अपने प्रिय भक्त सालबेग का इंतजार कर रहे हैं. जब सालबेग वहां पहुंचे और उन्होंने भगवान के दर्शन किए, तभी रथ आगे बढ़ सका.
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आज भी निभाई जाती है यह परंपरा
सालबेग के निधन हो जाने के बाद उसी स्थान पर उनकी मजार बनाई गई. लोग बताते हैं कि तभी से हर साल रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ वहां कुछ देर के लिए रुकता है. इस मौके पर सालबेग के रचे भजन भी गाए जाते हैं. यह परंपरा आज भी लोगों को यह संदेश देती है कि भगवान के लिए सबसे बड़ा धर्म सच्ची भक्ति, प्रेम और समर्पण है.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.