Hindu Marriage Rules: सोशल मीडिया पर अक्सर एक चर्चा वायरल होती रही है कि ‘शास्त्रों में लिखा है कि एक स्त्री के 4 पति होते हैं.’ यह बात सुनकर कई लोग हैरान रह जाते हैं, कुछ इसे सच मान लेते हैं, तो कई इसे गलत समझकर खारिज कर देते हैं. यानी, लोग अक्सर दो हिस्सों में बंट जाते हैं. लेकिन सच इन दोनों के बीच है. सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में इसका उल्लेख जरूर मिलता है, लेकिन क्या इसका मतलब 4 शादी या बहु-पति प्रथा है या असल बात कुछ और ही है. आइए,इसे जानते हैं कि विवाह से पहले कन्या पर किसका अधिकार माना गया है?
क्या कहते हैं वेद?
सबसे प्राचीन वेद, ऋग्वेद के 10वें मंडल के सूक्त 85 के 40वें श्लोक में कहा गया है:
‘सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः.
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः॥’
इस अर्थ है: सोम यानी चंद्रमा ने सबसे पहले (कन्या को) प्राप्त किया, फिर गंधर्व उसे पाने वालों के दूसरे स्थान पर हैं, फिर अग्नि तीसरे पति हैं और चौथा पति मनुष्य है.
ऐसा ही मंत्र अथर्ववेद में भी मिलता है.
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तो क्या सच में 4 पति होते हैं?
इस श्लोक के कारण कई कन्फ्यूजन हो चुके हैं. लोग ये मान लेते हैं कि सच में एक स्त्री के 4 पति होते हैं. लेकिन क्या यह वाकई में सच है. इसका जवाब है- नहीं. यहां सबसे जरूरी बात ‘पति’ शब्द का अर्थ समझना है. वैदिक संदर्भ में इसका मतलब सिर्फ जीवनसाथी नहीं, बल्कि रक्षक, संरक्षक और पालन करने वाला भी होता है. इसलिए इस मंत्र को शाब्दिक अर्थ में नहीं, बल्कि उसके संदर्भ में समझना जरूरी है.
ये 4 संरक्षक कौन हैं?
वैदिक परंपरा के अनुसार, कन्या के जीवन के अलग-अलग चरणों में अलग-अलग देवताओं का प्रतीकात्मक संरक्षण माना गया है:
-सोम देव: ये बचपन, मन की पवित्रता और कोमल स्वभाव के प्रतीक हैं. इसलिए उन्हें पहला संरक्षक माना गया.
-गंधर्व देव: ये किशोरावस्था, भावनाओं, सौंदर्य और कला से जुड़े माने गए हैं. इसलिए दूसरा संरक्षण उनसे जोड़ा गया.
-अग्नि देव: ये विवाह संस्कार के साक्षी हैं. वे पवित्रता, ऊर्जा और नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक हैं. इसलिए विवाह के समय उन्हें तीसरा संरक्षक माना गया.
इसके बाद विवाह पूरा होने पर सांसारिक पति कन्या का चौथा और वास्तविक संरक्षक बनता है, जिसके साथ वह गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियां निभाती है.
वास्तव में मैसेज क्या है?
पूरी मान्यता एक लड़की के जीवन के चार महत्वपूर्ण पड़ावों को समझाती है. बचपन, किशोरावस्था, विवाह संस्कार और गृहस्थ जीवन. हर चरण को एक दिव्य शक्ति से जोड़कर यह संदेश दिया गया कि स्त्री सम्मान, सुरक्षा और गरिमा की अधिकारी है. यहां जीवन के चार चरणों में मिलने वाले प्रतीकात्मक संरक्षण की बात करते हैं. यही इस वैदिक परंपरा का वास्तविक अर्थ है.
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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.
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