Ashok Ashtami 2026: चैत्र माह में आने वाली अशोक अष्टमी एक ऐसा व्रत है, जिसे दुख, चिंता और रोगों से राहत पाने के लिए किया जाता है. यह दिन भक्ति, आस्था और उम्मीद का प्रतीक माना जाता है. खास बात यह है कि यह पर्व चैत्र नवरात्रि के दौरान आता है, जब शक्ति उपासना अपने चरम पर होती है और घर-घर पूजा का माहौल रहता है. आइए जानते हैं, यह व्रत देवी सीता और हनुमान जी से कैसे जुड़ा है?
अशोक अष्टमी 2026 कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार, यह व्रत चैत्र शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है. वर्ष 2026 में अशोक अष्टमी 26 मार्च को मनाई जाएगी. इस यह तिथि नवरात्रि के मध्य में पड़ने के कारण और भी खास मानी जा रही है.
रामायण से जुड़ा भावुक प्रसंग
अशोक अष्टमी का संबंध रामायण के उस ऐतिहासिक क्षण से है जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे थे. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि पर हनुमान जी ने अशोक वाटिका में शोक-मग्न माता सीता को भगवान राम की मुद्रिका यानी अंगूठी सौंपी थी. श्री राम का संदेश पाकर माता सीता का दुख कम हुआ और उन्हें दुखों से मुक्ति की आशा मिली. इसीलिए इस दिन को निराशा पर विजय का प्रतीक माना जाता है.
अशोक कालिका प्राशन
इस व्रत को ‘अशोक कालिका प्राशन व्रत’ भी कहा जाता है. इसमें अशोक के वृक्ष की कोमल कलियों और पत्तों के रस का सेवन किया जाता है. आयुर्वेद और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन अशोक की 8 कलियों का सेवन करने से शरीर के समस्त रोगों का नाश होता है. यह व्रत शारीरिक व्याधियों से मुक्ति दिलाकर दीर्घायु प्रदान करता है.
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अशोक अष्टमी व्रत के दिन के शुभ मुहूर्त
द्रिक पंचांग के अनुसार, अशोक अष्टमी व्रत के दिन के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं:
- अभिजित मुहूर्त: 11:48 ए एम से 12:37 पी एम
- विजय मुहूर्त: 02:15 पी एम से 03:04 पी एम
- अमृत काल: 06:50 ए एम से 08:21 ए एम
- सर्वार्थ सिद्धि योग: 04:19 पी एम से 06:03 ए एम, मार्च 27
- रवि योग: 04:19 पी एम से 06:03 ए एम, मार्च 27
पूजा की सरल विधि
– अशोक अष्टमी के दिन सुबह स्नान के बाद अशोक के वृक्ष की पूजा करनी चाहिए.
– अशोक अष्टमी के दिन सुबह स्नान के बाद अशोक के वृक्ष की पूजा करनी चाहिए.
– अशोक वृक्ष को जल अर्पित करें और धूप-दीप दिखाएं.
– इसके बाद वृक्ष से 8 कोमल कलियां या पत्तियां तोड़ें.
– इन कलियों को भगवान शिव और माता पार्वती को अर्पित करें.
– पूजा के बाद इन कलियों को प्रसाद के रूप में ग्रहण करके अपना व्रत खोलें.
अशोक वृक्ष को जल अर्पित करें और धूप-दीप दिखाएं.
इसके बाद वृक्ष से 8 कोमल कलियां या पत्तियां तोड़ें.
इन कलियों को भगवान शिव और माता पार्वती को अर्पित करें.
पूजा के बाद इन कलियों को प्रसाद के रूप में ग्रहण करके अपना व्रत खोलें.
पढ़ें यह प्रभावशाली अशोक मंत्र
कलियों का सेवन करते समय इस विशेष मंत्र का उच्चारण करना चाहिए:
‘त्वामशोक नमाम्येन मधुमाससमुद्भवम्. शोकार्तः कलिकां प्राश्य मामशोकं सदा कुरु॥’
इसका अर्थ है: ‘हे अशोक वृक्ष, जो वसंत ऋतु में उत्पन्न होते हैं, मैं दुख से परेशान होकर आपकी पवित्र कलियों का सेवन कर रहा हूं. कृपया मेरे सभी शोक और कष्ट दूर करें और मुझे हमेशा खुश रखें.’
अशोक अष्टमी व्रत के लाभ
कूर्म पुराण और अन्य ग्रंथों में इस व्रत का उल्लेख मिलता है. इसमें अशोक की कलियों के सेवन को स्वास्थ्य के लिए लाभकारी बताया गया है. कुछ मान्यताओं के अनुसार, यह शरीर की ऊर्जा को संतुलित करता है और मन को शांत करता है. मान्यता है कि यदि यह व्रत बुधवार या पुनर्वसु नक्षत्र में पड़े, तो इसका फल कई गुना बढ़ जाता है. ऐसी स्थिति में जीवन में बड़े दुख नहीं आते, ऐसा विश्वास किया जाता है.
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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.
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