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Ahilya Uddhar Katha: पत्थर क्यों बनीं अहिल्या, भगवान राम ने कैसे किया उद्धार? जानें इंद्र का छल और गौतम ऋषि के श्राप का रहस्य

Ahilya Uddhar Katha: इंद्र के छल और गौतम ऋषि के श्राप की वजह से अहिल्या पत्थर बन गईं. फिर त्रेतायुग में उसे श्राप से मुक्ति मिली. आइए जानते हैं, अहिल्या कौन थी, पत्थर कैसे बनी, इंद्र ने कौन-सा छल किया था और भगवान राम कैसे किया अहिल्या उद्धार? पढ़ें यह रोचक कथा.

Ahilya Uddhar Katha: पत्थर बनी अहिल्या का उद्धार त्रेतायुग की एक बेहद महत्वपूर्ण घटना है. इस घटना से भगवान राम की दैवी शक्ति के बारे में पहली बार आम लोगों को पता चला. वाल्मीकि रामायण के अनुसार, यह घटना तब घटित हुई, जब भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और गुरु विश्वामित्र के साथ जनकपुर जा रहे थे. आइए जानते हैं, भगवान राम द्वारा अहिल्या उद्धार की यह घटना विस्तार से कि…अहिल्या पत्थर कैसे बनी, इंद्र ने कौन-सा छल किया था, गौतम ऋषि ने क्यों श्राप दिया और भगवान राम ने कैसे किया अहिल्या का उद्धार?

अहिल्या कौन थी?

रामायण और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, अहिल्या को ब्रह्माजी ने अपने मन से रचा था यानी वे ब्रह्माजी की 'मानस-पुत्री' थी. कहते हैं, अहिल्या को ब्रह्माजी ने बड़े जतन रचा था. यही कारण है कि उन्हें अपने समय में सबसे सुंदर स्त्री माना गया था. कहते हैं, वह सौंदर्य में अद्वितीय थी और उनकी खूबसूरती पर देवता भी मोहित थे और उससे विवाह करना चाहते थे.

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अहिल्या हिंदू धर्म की पवित्र पंचकन्याओं में गिनी जाती हैं, जिनका नाम सुबह लेने से पाप दूर हो जाते हैं. उनका विवाह सप्तर्षियों में से एक, महान तपस्वी और ज्ञानी गौतम ऋषि से हुआ था. गौतम ऋषि वैदिक काल के प्रमुख ऋषियों में माने जाते हैं और ऋग्वेद में उनके नाम से कई मंत्र और सूक्त मिलते हैं.

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इंद्र ने कौन-सा छल किया

पौराणिक कथा के अनुसार, एक दिन गौतम ऋषि आश्रम से बाहर गए हुए थे. उनकी अनुपस्थिति में इंद्र, गौतम ऋषि का रूप धारण करके आश्रम में पहुंचे. रूप बदले हुए इंद्र ने अहिल्या को प्रणय के लिए राजी करने की कोशिश की. लेकिन अहिल्या ने पहचान लिया कि यह उनके पति नहीं हैं और अपनी अनुमति नहीं दी. इसके बावजूद इंद्र ने उनसे जबरदस्ती करने की कोशिश की. उसी दौरान गौतम ऋषि आश्रम लौट आए और उन्होंने इंद्र को अपने ही वेश में देखा. यह देखकर वे कुपित हो उठे और इंद्र को एक भीषण श्राप दे दिया.

इंद्र को दिया ये अजीब श्राप

पुराणों में बताया गया है कि इंद्र के शरीर पर बहुत-सी आंखें इसलिए थीं, क्योंकि उन्हें गौतम ऋषि का कठोर श्राप मिला था. कथा के अनुसार, गौतम ऋषि ने अत्यंत क्रोधित होकर इंद्र को श्राप दिया था कि उनके भीतर छिपी वासना उनके शरीर पर भी दिखाई देगी. इस श्राप के कारण इंद्रदेव के शरीर के सभी रोम-छिद्र स्त्री-योनियों के रूप में प्रकट हो गए. बाद में देवताओं के आग्रह पर, भगवान की कृपा से वे योनियां बदलकर आंखों में परिवर्तित हो गईं.

अहिल्या को दिया पत्थर होने का श्राप

इसके बाद, गौतम ऋषि अत्यंत क्रोधित हो गए और बिना सोच-समझे अहिल्या को भी श्राप दे दिया. उन्होंने कहा कि तुम हजारों वर्षों तक यहां पत्थर बनी रहोगी, केवल हवा पर जीवित रहोगी और राख में पड़ी हुई हर कष्ट सहोगी. यह सुनकर अहिल्या ने विनम्रता से कहा कि इस घटना में उनकी कोई इच्छा या सहमति नहीं थी. उन्होंने बताया कि यदि इंद्र ने आपका रूप न धारण किया होता, तो वह कभी उनके पास आने की हिम्मत नहीं कर पाते.

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ऋषि ने फिर अहिल्या से कही ये बात

यह सुनकर गौतम ऋषि को अहिल्या को दिए गए श्राप पर पछतावा हुआ. उन्होंने कहा कि दिया हुआ श्राप तो अब वापस नहीं लिया जा सकता, इसलिए यह घटित होगा ही. लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि त्रेतायुग में जब भगवान राम इस वन में आएंगे, तब उनकी कृपा से तुम्हारा उद्धार होगा. उस समय तुम अपना पूर्व रूप वापस पाकर पुनः मेरे पास लौट सकोगी. यह कहकर गौतम ऋषि आश्रम छोड़कर हिमालय की ओर चले गए और वहां कठोर तपस्या में लीन हो गए.

भगवान राम ने ऐसे किया अहिल्या का उद्धार

त्रेतायुग में, जब भगवान राम और लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के साथ अयोध्या से जनकपुर धनुष यज्ञ के लिए जा रहे थे, तो रास्ते में उन्हें एक वीरान आश्रम दिखा. राम ने कहा, 'ही ऋषिवर! यह जगह तो आश्रम जैसी लग रही है, लेकिन यहां कोई ऋषि या मुनि क्यों नहीं हैं?' विश्वामित्र जी ने उत्तर दिया, 'यह कभी महर्षि गौतम का आश्रम था. वे अपनी पत्नी के साथ यहां रहकर तपस्या करते थे.' फिर उन्होंने इंद्र के छल और अहिल्या पर लगे श्राप की पूरी कथा सुनाई.

इसके बाद, विश्वामित्र जी ने कहा, 'हे राम! अब तुम आश्रम के अंदर जाकर अहिल्या का उद्धार करो.' यह सुनकर राम और लक्ष्मण दोनों भाई आश्रम के भीतर गए. कहते हैं, जब पत्थर बनी अहिल्या पर भगवान राम के चरण की धूल पड़ी तो उनके पवित्र चरण-धूलि से अहिल्या एक बार फिर सुन्दर नारी के रूप में बदल गई. अहिल्या ने राम-लक्ष्मण को प्रणाम किया और गौतम ऋषि के पास चले गई.

रामायण और रामचरितमानस में इस घटना का विस्तार से वर्णन मिलता है. यह घटना हमें यह सिखाती है कि भगवान की शरण में जाने से सभी पाप और श्राप से मुक्ति मिल सकती है और श्रद्धा और सच्ची भक्ति का फल हमेशा मिलता है.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।


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