अगर किसी आपराधिक केस में गई नौकरी तो क्या बरी होने के बाद मिल सकती है वापस? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किया साफ
अगर किसी व्यक्ति की किसी आपराधिक केस के चलते नौकरी चली जाए तो क्या केस में बरी होने के बाद उसे अपनी नौकरी वापस मिल सकती है? कई लोगों के मन में ये सवाल उठता है. तो अब इस सवाल का जवाब दिया है इलाहाबाद हाईकोर्ट ने. जी हां, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर स्थिति साफ कर दी है.

कोर्ट ने क्या कहा?
2 / 6दरअसल, हाई कोर्ट ने एक केस में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा है कि केवल आपराधिक मामले में बरी होने के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी को स्वत: सेवा में बहाल नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने आगे कहा कि यदि किसी विभागीय जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो ऐसी कार्रवाई बरकरार रह सकती है, भले ही आपराधिक मुकदमे में अभियुक्त को राहत मिल गई हो.
किससे जुड़ा था मामला?
3 / 6मिली जानकारी के अनुसार, पुलिस कांस्टेबल कुंवर पाल सिंह की याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला दिया. कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमा और विभागीय कार्यवाही अलग-अलग दायरे में चलते हैं और दोनों के मानक भी अलग होते हैं.
नहीं पड़ेगा विभागीय कार्रवाई का प्रभाव
4 / 6कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि दोनों कार्यवाहियों में आरोप, साक्ष्य और गवाह समान हों और आपराधिक न्यायालय द्वारा सम्मानपूर्वक बरी किया गया हो, तो स्थिति अलग हो सकती है. लेकिन यदि बरी होना केवल संदेह का लाभ या गवाहों के मुकर जाने के कारण हुआ हो तो विभागीय कार्रवाई पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता है.
क्या है पूरा मामला?
5 / 6बता दें कि मामले के अनुसार, याची फिरोजाबाद जिले में तैनात था. उस दौरान उसके मुल्जिम को जेल से एक बंदी को अदालत में पेश करने की जिम्मेदारी मिली. इस दौरान ड्यूटी पर ज्यादा शराब का सेवन करने के कारण उसकी सरकारी राइफल से गोली चल गई. इस दौरान हादसे में दो लोग घायल हुए. जिसके बाद धारा 370 आईपीसी में केस दर्ज किया गया. साथ ही याची के खिलाफ विभागीय जांच भी शुरू की गई. मेडिकल जांच में ये साबित हो गया कि याची ने घटना के समय शराब पी रखी थी.
मुकर गए मुख्य गवाह
6 / 6इस मामले में अदालत ने पाया कि आपराधिक मुकदमे में मुख्य गवाह मुकर गए थे, जिसके कारण याची को बरी कर दिया गया. वहीं, विभागीय जांच में चिकित्सीय परीक्षण सहित पर्याप्त साक्ष्य मौजूद थे, जिससे यह साबित हो गयाकि घटना के समय याची ड्यूटी के समय नशे की हालत में था और उसकी लापरवाही से गोली चली. अदालत ने कहा कि यह 'क्लीन एक्विटल' (पूर्णत: निर्दोष साबित होना) का मामला नहीं है. विभागीय जांच में प्रस्तुत अधिक ठोस और व्यापक थे, जबकि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष कमजोर पड़ा. इन तथ्यों को देखते हुए ही हाईकोर्ट ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और पुनरीक्षण प्राधिकारी के आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका को खारिज कर दिया.