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Catwalk Ka Ithas: फैशन की दुनिया में हमेशा से बदलाव आते रहे हैं, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के बाद इसमें तेजी से विस्तार और बड़े बदलाव देखने को मिले. हालांकि फैशन शो का इतिहास 19वीं सदी से जुड़ा है, जब डिजाइनर्स अपने कपड़ों को लोगों के सामने पेश करने के लिए लाइव प्रेजेंटेशन करने लगे थे. शुरुआत में मॉडल्स छोटे-छोटे सैलून या बुटीक में लोगों के सामने कपड़े पहनकर दिखाती थीं. यही परंपरा बाद में बड़े हॉल और मंच तक पहुंची, जहां रैंप तैयार किए जाने लगे. फैशन शो में जब मॉडल्स रैंप पर चलती हैं तो उसे कैटवॉक कहा जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसे Catwalk ही क्यों कहा जाता है?इसके पीछे फैशन इंडस्ट्री से जुड़ा दिलचस्प इतिहास क्या छिपा है, आइए जानते हैं.

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कैटवॉक का मतलब है कि बिल्ली की चाल यानी जब बिल्ली चलती है तो उसका अंदाज बहुत ही अच्छा होता है. ठीक उसी तरह मॉडल्स भी रैंप पर संतुलन और ग्रेस के साथ चलती हैं.

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इतिहासकारों के अनुसार, 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में यूरोप और अमेरिका में फैशन शो आयोजित होने लगे थे. उस समय रैंप काफी संकरे बनाए जाते थे.

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रैंप पर चलते समय मॉडल्स भी बिल्ली की चाल वाली तकनीक का पालन करती हैं, वे अपने पैरों को एक दूसरे के सामने यानी क्रॉस-स्टेप रखती हैं ताकि वे एक सीधी और पतली रेखा पर चल सकें.

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इसे डॉग वॉक इसलिए नहीं कहा जाता क्योंकि कुत्ता बहुत इधर से उधर भागता है और इसकी चाल अच्छी भी नहीं होती है. वहीं, फैशन इंडस्ट्री में ग्रेस और एलिगेंस ज्यादा मायने रखते हैं.

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प्लेन एक्सप्रेशन रैंप वॉक यानी बिना चेहरे का भाव जताए या बदले रैंप वॉक की शुरुआत परेड शो के करीब 100 साल बाद हुई. करीब 1960 ईस्वी में. इसे तब बेहद कलापूर्ण माना गया. अब तो भारतीय मॉडल्स कई विदेशी कंपनियों के साथ काम कर रहे हैं.