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महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में भीष्म पितामह का शरशय्या पर लेटे रहना भारतीय संस्कृति का एक ऐसा प्रसंग है, जो मानव सहनशीलता और आध्यात्मिक बल की सीमाओं को परिभाषित करता है. दसवें दिन अर्जुन के असंख्य बाणों से पीड़ित होकर वे युद्धभूमि में ही बाणों की शय्या पर शयन करने लगे, किंतु इच्छामृत्यु के वरदान के बावजूद तत्काल प्राण त्यागने का मार्ग न चुना.

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शास्त्रों के अनुसार, लगभग 58 दिनों तक इस अमानवीय पीड़ा को सहते हुए उन्होंने सूर्य के उत्तरायण गमन की प्रतीक्षा की. यह काल केवल शारीरिक संयम का नहीं, अपितु धर्म स्थापना और आत्मज्ञान का सर्वोच्च उदाहरण था. इस वर्ष भीष्म अष्टमी, जो 26 जनवरी को मनाई जाएगी, इस तपस्वी योद्धा के परिनिर्वाण की स्मृति को ताजा करती है.

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दसवें दिन का वह भयंकर संग्राम कुरु वंश के पतन का सूचक बन चुका था. अर्जुन की गुप्त बाण-चापनी से भीष्म का विशालकाय शरीर बाणमय शय्या पर गिर पड़ा. प्रत्येक बाण उनके अंगों को छलनी कर रहा था, फिर भी प्राणों का संचालन अटल रहा. इच्छामृत्यु वरदान, जो गंगापुत्र भीष्म को शरत् चन्द्रवंश के पितामह ने प्रदान किया था, उन्हें मृत्यु का स्वेच्छ समय चुनने की शक्ति देता था. लेकिन उन्होंने अधर्म के मार्ग पर चल रहे कौरवों को त्यक्त कर धर्मराज युधिष्ठिर के पक्ष में निर्णय लिया.

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शरशय्या पर लेटे हुए भीष्म ने न तो शत्रु से बदला लिया, न ही विजयी पांडवों को शाप दिया. यह संयम उनके ब्रह्मचर्य व्रत और पितृधर्म की पराकाष्ठा था. महाभारत में वर्णित है कि उनकी दृष्टि आकाश की ओर लगी रही, जहां वे सृष्टि चक्र का निरीक्षण कर रहे थे. योग और प्राणसंयम ने इस चमत्कार को संभव बनाया. पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है कि भीष्म महान योगी थे, जिन्होंने प्राणायाम और ध्यान के द्वारा इंद्रियग्रंथियों को पूर्ण अधीन किया.

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गंभीर घावों से रक्तस्राव होते हुए भी उन्होंने हृदय की धड़कन धीमी कर ली, जिससे शरीर का क्षय रुक गया. न्यूनतम जल ग्रहण और पूर्ण मानसिक एकाग्रता ने उन्हें जीवित रखा. यह अवस्था सामान्य चिकित्सा विज्ञान से परे है, किंतु योगशास्त्र इसे प्राणशक्ति का प्रमाण मानता है. भीष्म ने स्वयं कहा था कि शरीर मरणशील है, किंतु आत्मा अमर. शरशय्या उनके लिए तपश्चयनी बन गई, जहां प्रत्येक क्षण धर्मचिंतन में बीता. कौरवों के निकट बैठे हुए भी वे पक्षपात रहित ज्ञान बांटते रहे.

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इस काल में भीष्म ने युधिष्ठिर को अनुपम उपदेश दिए, जो महाभारत के शांति, अनुशासन और श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धांतों का आधार बने. राजधर्म, अर्थनीति, काम नियंत्रण और मोक्ष मार्ग पर उनके वचन आज भी प्रासंगिक हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि शासक को प्रजा हित सर्वोपरि रखना चाहिए. कौरवों को उन्होंने अधर्म का दंड मिलने का कारण बताया, जबकि पांडवों को विजय के बाद भी संयम बरतने की शिक्षा दी. यह 58 दिन कुरुक्षेत्र का ज्ञान भंडार बन गया.

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भीष्म अष्टमी पर श्रद्धालु व्रत रखकर इस तप का स्मरण करते हैं, क्योंकि उत्तरायण पर प्राण त्यागने से मोक्ष प्राप्ति का विश्वास है. भीष्म का शरशय्या प्रसंग आधुनिक मनुष्य को धैर्य, संयम और कर्तव्यनिष्ठा का पाठ पढ़ाता है. आज जब तात्कालिक सुख की दौड़ में जीवन व्यतीत हो रहा है, वहां पितामह का तप आत्मबल का प्रतीक बनता है.

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महाभारतकार व्यास ने इसे अमर बनाया, ताकि पीढ़ियां सीखें कि विपरीत परिस्थितियां भी धर्म पथ पर अडिग रख सकती हैं. शरशय्या पर लेटे भीष्म न केवल कुरु वंश के पितामह थे, अपितु समस्त मानवजाति के लिए तपस्वी आदर्श. उनका परिनिर्वाण सूर्य उत्तरायण में हुआ, जो शुभारंभ का संकेत था. यह कथा हमें स्मरण कराती है कि वास्तविक विजय शरीर पर नहीं, मन पर होती है.