जंगलों की खामोशी में जब एक बंदूक शांत होती है, तो क्या युद्ध वाकई खत्म हो जाता है? या फिर वह केवल अपना मैदान बदल लेता है?
दशकों तक जिस गलियारे ने हिंदुस्तान के नक्शे पर एक गहरा जख्म बनाए रखा, जहां सुकमा, बीजापुर और गढ़चिरौली के जंगलों में बारूद की गंध हवा में तैरती थी, आज उस जमीन पर तस्वीर बदल चुकी है. सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों और कड़े प्रहारों ने हथियारबंद दस्तों को लगभग बैकफुट पर धकेल दिया है. लेकिन ठीक इसी मोड़ पर, जब देश अपनी आजादी का पर्व मना रहा था, लाल किले की प्राचीर से गूंजे एक नए शब्द ने देश के बौद्धिक, कानूनी और सियासी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी.
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शब्द जो शायद पहले राजनीति की डिक्शनरी का हिस्सा ना रहा हो, लेकिन कहीं ना कहीं उसके भाव मौजूद रहे हैं 'दिमागी नक्सल'. और बात इतनी भी साधारण और नई नहीं है. सैकड़ों वर्षों पहले, वाद-विवाद और संवाद की आधुनिक शैली से भी पहले एक बूढ़ा आदमी तार्किकता को जन्म देता है. कैसे? सिर्फ सवाल पूछ कर, सत्ता के खिलाफ नहीं, मगर सत्ता के पक्ष में भी नहीं.
एथेंस की गलियों में एक बूढ़ा आदमी लोगों को रोक-रोककर सवाल किया करता था. उसके पास कोई पद नहीं था, कोई सेना नहीं थी, कोई सरकारी कुर्सी नहीं थी. वह बस सवाल पूछता था. सामने वाला कुछ कहता, वह फिर पूछता कि 'ऐसा क्यों?' अगर जवाब मिल भी जाता तो अगला सवाल तैयार रहता. धीरे-धीरे सामने वाला अपनी ही बात के बारे में सोचने लगता और उस बूढ़े आदमी का नाम था सुकरात.
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सुकरात से भी पहले भारतीय उपमहाद्वीप और यहां की संस्कृति में सवाल-जवाब से ही ग्रन्थ बने हैं, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है श्रीमद्भगवद्गीता, जहां अर्जुन पूछ रहा है और श्रीकृष्ण उसे जवाब दे रहे हैं. उपनिषदों में नचिकेता अपने पिता से सवाल करता है और फिर मृत्यु के देवता यम के सामने जाकर जीवन और मृत्यु का अर्थ पूछता है.
गार्गी याज्ञवल्क्य से सवाल करती हैं. बुद्ध के सामने लोग सवाल लेकर आते हैं. जैन परंपरा में भी तर्क और विचार की लंबी परंपरा रही. चार्वाक तो ऐसी धारा थी जो ईश्वर और धार्मिक मान्यताओं तक पर सवाल उठाती थी. मतलब साफ है कि भारत की बौद्धिक परंपरा में सवाल पूछना कोई विदेशी चीज नहीं थी. लेकिन ये सत्ता के सवाल नहीं थे, ये सवाल लोकतंत्र की धारा में नहीं थे.
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तो लोकतंत्र की इस धारा में पूछे गए सवालों को क्या कहा जाए और सवाल पूछने वाले को क्या कहा जाए?
सुकरात का तरीका बड़ा सीधा था. वह सामने वाले से कहता नहीं था कि 'तुम गलत हो'. वह सवाल पूछता था, ताकि सामने वाला खुद अपनी बात की जांच करे. लेकिन यही तरीका कई लोगों को परेशान करने लगा. सवाल कभी-कभी इतने सीधे होते थे कि बड़े-बड़े लोग भी असहज हो जाते थे.
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देश में सरकार से सवाल करने वाला क्या है? विरोध करने वाला क्या है? व्यवस्था की कमियां बताने वाला क्या है? और अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसी विचारधारा का समर्थन करता है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही बदलना चाहती है, तो उसके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए? और यही सवाल भी हमें उस शब्द के करीब लेकर आता है जिसे 'दिमागी नक्सल' कहा गया.
हमारी सभ्यता में एक बात बार-बार दिखाई देती है कि बात को केवल इसलिए सही नहीं मान लेना कि वह पुरानी है, बड़ी है या किसी बड़े व्यक्ति ने कही है. लेकिन यह तस्वीर पूरी नहीं है. क्योंकि हर सवाल अच्छा सवाल नहीं होता. हर विचार लोकतांत्रिक नहीं होता और हर असहमति अपने आप सही नहीं हो जाती और यहीं से कहानी मुश्किल होती है.
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मान लीजिए कोई व्यक्ति सरकार की किसी नीति का विरोध करता है. वह कहता है कि सरकार ने किसानों के साथ गलत किया, वह बेरोजगारी पर सवाल उठाता है. वह किसी कानून की आलोचना करता है. वह कहता है कि किसी समुदाय या आदिवासी समाज के साथ अन्याय हो रहा है.
तो क्या वह देश विरोधी है?
नहीं.
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना नागरिक का अधिकार है, बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार से सवाल करने वाले लोग जरूरी होते हैं. लेकिन अब दूसरी स्थिति देखिए कि अगर कोई व्यक्ति कहता है कि लोकतंत्र ही गलत व्यवस्था है. चुनाव की जरूरत नहीं है. संविधान को खत्म कर देना चाहिए. हिंसा के जरिए सत्ता पर कब्जा करना सही है. निर्दोष लोगों को मारना किसी बड़े राजनीतिक लक्ष्य के लिए उचित है.
क्या इसे भी केवल 'असहमति' कह दिया जाए? शायद नहीं.
यहीं असहमति और उग्र विचारधारा के बीच फर्क करना जरूरी हो जाता है और इसी जगह 'दिमागी नक्सल' शब्द की बहस पैदा होती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में 'हथियारी नक्सल' और 'दिमागी नक्सल' के बीच फर्क करते हुए यह तर्क रखा कि बंदूक उठाने वाले नक्सलवाद से लड़ाई के साथ उस विचार से भी लड़ना होगा जो उस हिंसा को वैचारिक आधार देता है. इस बात को समझने का एक तरीका यह है कि किसी भी हिंसक आंदोलन के पीछे केवल हथियार नहीं होते. उसके पीछे एक विचार भी होता है. कोई यह समझाता है कि व्यवस्था गलत है, राज्य गलत है और उसे बदलने के लिए हिंसा जरूरी है. अगर कोई व्यक्ति उस हिंसा को सही मानता है, उसका समर्थन करता है या उसे आगे बढ़ाने में मदद करता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल इसलिए उसे निर्दोष मान लिया जाए क्योंकि उसके हाथ में बंदूक नहीं है?
यह सवाल गंभीर है. लेकिन इसके साथ दूसरा सवाल भी उतना ही गंभीर है कि कौन तय करेगा कि कौन 'दिमागी नक्सल' है?
अगर कोई सरकार की आलोचना करे, तो क्या वह दिमागी नक्सल है? या अगर कोई आदिवासियों के अधिकार की बात करे, तो क्या वह दिमागी नक्सल है? या अगर कोई पुलिस की किसी कार्रवाई पर सवाल उठाए, तो क्या वह दिमागी नक्सल है? अगर कोई पूंजीवाद की आलोचना करे, तो क्या वह दिमागी नक्सल है? अगर कोई वामपंथी विचार रखता है, तो क्या वह दिमागी नक्सल है?
इन सवालों का जवाब 'हां' होगा तो लोकतंत्र में असहमति के लिए बहुत कम जगह बचेगी. इसलिए असली लड़ाई शायद 'दिमागी नक्सल' शब्द को लेकर नहीं है. असली लड़ाई यह है कि विचार और अपराध के बीच सीमा कहां खींची जाए. यही सवाल हमें फिर सुकरात के पास ले जाता है. सुकरात किसी व्यक्ति को उसके विचार से पहले समझना चाहता था. वह पूछता था कि तुम ऐसा क्यों सोचते हो? शायद आज हमें भी यही सवाल पूछने की जरूरत है. अगर कोई नक्सली हिंसा का समर्थन करता है, तो उससे पूछा जाना चाहिए, क्यों? अगर कोई लोकतंत्र को खत्म करने की बात करता है, तो उससे पूछा जाना चाहिए, क्यों? अगर कोई सरकार को गलत कहता है, तो उससे भी पूछा जाना चाहिए, क्यों?
अंतर यह है कि पहले मामले में उसके विचारों की जांच के साथ कानून की भूमिका भी आएगी. दूसरे में लोकतंत्र की रक्षा का सवाल आएगा. तीसरे में लोकतंत्र स्वयं उस आलोचना को जगह देगा, यानी हर विचार का जवाब एक जैसा नहीं हो सकता. भारत की परंपरा में शास्त्रार्थ का मतलब भी यही था. सामने वाले को सुनना, उसकी बात समझना और फिर तर्क से जवाब देना.
क्या किसी विचार को हराने के लिए उसे समझना जरूरी है? या सिर्फ उसका नाम रख देना काफी है?
इसलिए इस शब्द को समझने के लिए हमें दो गलतियों से बचना होगा. पहली गलती कि हर सरकार-विरोधी आवाज को 'दिमागी नक्सल' मान लेना और दूसरी गलती कि हर नक्सली विचारधारा के समर्थक को केवल 'असहमति की आवाज' मान लेना. दोनों अतियां हैं और लोकतंत्र इन दोनों के बीच की पतली रेखा पर चलता है और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है.
भारत में सवाल पूछने की परंपरा बहुत पुरानी है. लेकिन भारत ने यह भी देखा है कि विचार जब हिंसा का रूप लेता है तो उसका असर केवल संसद या टीवी स्टूडियो तक नहीं रहता. वह गांव के उस आदमी तक पहुंचता है जिसे पता भी नहीं होता कि उसके नाम पर कौन-सी क्रांति लड़ी जा रही है. इसलिए हमें सवाल पूछने वाले और हिंसा को सही ठहराने वाले के बीच फर्क करना ही होगा, लेकिन उतना ही जरूरी है कि हम सरकार से सवाल पूछने वाले और हिंसक विचारधारा के समर्थक के बीच भी फर्क करें. क्योंकि लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि वह अपने नागरिक को सवाल पूछने की आजादी देता है और लोकतंत्र की मजबूती यह है कि वह हिंसा को विचार की ढाल बनाकर स्वीकार नहीं करता.
तो फिर सवाल बचता है कि 'दिमागी नक्सल' आखिर कौन है?
क्या वह व्यक्ति जो बंदूक नहीं उठाता, लेकिन बंदूक की विचारधारा को सही मानता है? या वह व्यक्ति भी इस नाम का शिकार हो सकता है जो सिर्फ इसलिए सवाल पूछता है क्योंकि उसे लगता है कि सत्ता गलत हो सकती है? इसका जवाब अभी देना जल्दबाजी होगी. क्योंकि इसके लिए हमें पहले उस विचार को समझना होगा जिसने भारत में नक्सलवाद को जन्म दिया. हमें नक्सलबाड़ी जाना होगा, जमीन के सवाल तक जाना होगा, आदिवासी समाज की पीड़ा को समझना होगा, माओवादी विचारधारा को जानना होगा और फिर देखना होगा कि एक विचार कब सवाल से विद्रोह बनता है, कब विद्रोह हिंसा बनता है और कब हिंसा को कोई व्यक्ति अपने दिमाग में सही ठहराने लगता है. क्योंकि बंदूक दिखाई देती है, मगर दिमाग दिखाई नहीं देता और शायद इसी वजह से दिमागी नक्सल की असली कहानी बंदूक से नहीं, विचार से शुरू होती है.
डिस्क्लेमर - लेखक ललित सिहाग एक पॉलिटिकल रिसर्चर हैं और वह पॉलिसी एवं पॉलिटिक्स पर लिखते हैं. लेख में साझा किए गए तथ्य लेखक के निजी विचार हैं.