भारत में मीडिया को 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ' कहा जाता है, लेकिन यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि यह कोई संवैधानिक प्रावधान या औपचारिक दर्जा नहीं है. भारतीय संविधान में कहीं भी चौथा स्तंभ, मीडिया, प्रेस या पत्रकार को लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में घोषित नहीं किया गया है. भारतीय लोकतंत्र के संवैधानिक स्तंभ मूलतः तीन माने जाते हैं-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका. इन्हें संविधान की संरचना और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के आधार पर संस्थागत मान्यता प्राप्त है. इसके अतिरिक्त चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक जैसी कुछ संस्थाओं को भी स्पष्ट संवैधानिक दर्जा प्राप्त है.
लेकिन मीडिया को ऐसा कोई संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है. चौथा स्तंभ शब्द वास्तव में एक राजनीतिक-दार्शनिक और लोकतांत्रिक अवधारणा है. यह अवधारणा यूरोप विशेषकर ब्रिटिश संसदीय परंपरा से विकसित हुई, जहां प्रेस को सत्ता की निगरानी करने वाली शक्ति माना गया. भारत में भी धीरे-धीरे यह शब्द लोकप्रिय हुआ और पत्रकारिता जगत ने स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहना शुरू किया. जबकि कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से यह शब्द सिर्फ प्रतीकात्मक मात्र है.
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असल में यह विडंबना है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में “प्रेस की स्वतंत्रता” शब्द संविधान में प्रत्यक्ष रूप से दर्ज नहीं है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन “फ्रीडम ऑफ प्रेस” का स्पष्ट उल्लेख नहीं करता. भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर अपनी व्याख्याओं के माध्यम से प्रेस स्वतंत्रता को लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा माना है, परंतु यह अधिकार अब भी प्रत्यक्ष संवैधानिक भाषा के बजाय न्यायिक व्याख्या पर आधारित है.
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भारतीय उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने अनेक फैसलों में प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक बताया है. अदालतों ने मीडिया को लोकतांत्रिक संरचना का महत्वपूर्ण अंग, पब्लिक वॉचडॉग, जनता की आँख और कान तथा लोकतंत्र का आवश्यक प्रहरी कहा है. लेकिन कभी न्यायपालिका ने औपचारिक संवैधानिक भाषा में यह नहीं कहा कि मीडिया संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त चौथा स्तंभ है.
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यही वह बिंदु है जहां आज गंभीर राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता दिखाई देती है. क्या अब समय आ गया है कि भारतीय संविधान में “प्रेस की स्वतंत्रता” और “पत्रकार” को स्पष्ट संवैधानिक मान्यता दी जाए? यह प्रश्न केवल मीडिया उद्योग या पत्रकारों के पेशे का प्रश्न नहीं है. यह भारतीय लोकतंत्र की संरचना, उसकी संस्थागत सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं के भविष्य का प्रश्न है.
दुनिया के कई लोकतंत्रों ने अपने ऐतिहासिक अनुभवों से सीखते हुए प्रेस स्वतंत्रता को स्पष्ट संवैधानिक संरक्षण दिया. अमेरिका के संविधान का फर्स्ट अमेंडमेंट साफ शब्दों में कहता है कि सरकार प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित नहीं कर सकती. यह केवल कानूनी प्रावधान नहीं था, बल्कि सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध एक लोकतांत्रिक सुरक्षा कवच था.
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जर्मनी ने नाज़ी शासन की भयावहता देखने के बाद अपने संविधान में प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को विशेष महत्व दिया. दक्षिण अफ्रीका ने रंगभेद के अनुभव से यह सीखा कि यदि सूचना पर नियंत्रण हो, तो अन्याय लंबे समय तक टिक सकता है. इसलिए वहां मीडिया की स्वतंत्रता को लोकतांत्रिक संरचना का आवश्यक तत्व माना गया. जापान समेत विश्व के कई देशों के संविधान में स्पष्ट तौर पर प्रेस की स्वतंत्रता को उल्लेखित किया गया है. इन देशों में प्रेस की स्वतंत्रता न्यायिक निर्वाचन पर निर्भर नहीं है.
जबकि भारत में पत्रकारिता ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. बात चाहे आजादी के दौर का या आजादी के बाद का ही क्यों न हो. अगर बात आजादी के समय की करें तो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं था, वह प्रतिरोध की आवाज थी. बाल गंगाधर तिलक ने “केसरी” के माध्यम से औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी. गणेश शंकर विद्यार्थी ने सांप्रदायिक हिंसा रोकने के प्रयास में अपने प्राण गंवा दिए. महात्मा गांधी ने पत्रकारिता को लोकमत निर्माण का साधन कहा. उस दौर की पत्रकारिता सत्ता से निकटता का माध्यम नहीं, बल्कि जनचेतना का आंदोलन थी. ब्रिटिश शासन अच्छी तरह समझता था कि अखबार केवल कागज़ नहीं होते, वे विचारों की क्रांति पैदा कर सकते हैं. इसलिए औपनिवेशिक शासन ने बार-बार प्रेस पर प्रतिबंध लगाए, संपादकों को जेल में डाला और समाचारपत्रों को बंद किया. इसका अर्थ यह था कि स्वतंत्रता आंदोलन की धड़कन में पत्रकारिता केंद्रीय भूमिका निभा रही थी.
लेकिन स्वतंत्र भारत में एक विचित्र स्थिति बनी. जिस पत्रकारिता ने लोकतंत्र को मजबूत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसे स्पष्ट संवैधानिक संरक्षण नहीं मिला. प्रेस की स्वतंत्रता न्यायपालिका की व्याख्या से विकसित अवधारणा बनकर रह गई. निस्संदेह, भारतीय न्यायपालिका ने इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सुप्रीम कोर्ट ने “रोमेश थापर बनाम स्टेट ऑफ मद्रास” मामले में कहा कि अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव है. “बृज भूषण बनाम स्टेट ऑफ दिल्ली” में अदालत ने प्री-सेंसरशिप पर गंभीर सवाल उठाए. “बेनेट कोलमैन एंड कंपनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि समाचारपत्रों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण भी प्रेस स्वतंत्रता पर हमला है.
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इन फैसलों ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत किया, लेकिन मूल प्रश्न अब भी बना हुआ है. यदि प्रेस लोकतंत्र की रीढ़ है, तो उसे प्रत्यक्ष संवैधानिक संरक्षण क्यों नहीं प्राप्त है? इस प्रश्न का सबसे कठोर उत्तर भारत ने आपातकाल में देखा. आपातकाल केवल राजनीतिक संकट नहीं था, वह सूचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सबसे बड़ी परीक्षा थी. अखबारों की बिजली काट दी गई. समाचारों को प्रकाशित होने से पहले सरकारी सेंसर अधिकारियों के पास भेजा जाने लगा. संपादकीय स्वतंत्रता लगभग समाप्त कर दी गई. कई पत्रकारों को जेल में डाला गया और असहमति को राष्ट्रविरोध की तरह प्रस्तुत किया गया.
उस दौर ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि प्रेस स्वतंत्रता केवल व्याख्याओं पर आधारित रहेगी और उसे स्पष्ट संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिलेगी तो सत्ता के केंद्रीकरण की स्थिति में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर पड़ सकती हैं. लेकिन आज की चुनौती केवल सरकारी सेंसरशिप तक सीमित नहीं है.
भारतीय पत्रकारिता आज एक दूसरे संकट से भी गुजर रही है. विश्वसनीयता के संकट से. मीडिया का एक हिस्सा सत्ता के अत्यधिक निकट दिखाई देता है, जबकि दूसरी ओर कुछ मंच स्वतंत्रता के नाम पर वैचारिक अभियानों का औजार बनते प्रतीत होते हैं. टीआरपी आधारित शोर, सनसनी, अधूरी सूचनायें, सोशल मीडिया आधारित अफवाहें और राजनीतिक ध्रुवीकरण ने पत्रकारिता की साख को प्रभावित किया है. कई टीवी स्टूडियो अब संवाद के मंच कम और राजनीतिक युद्धक्षेत्र अधिक दिखाई देते हैं.
समस्या यह नहीं है कि मीडिया में विचारधाराएं मौजूद हैं. समस्या तब उत्पन्न होती है जब तथ्य पीछे छूट जाते हैं और वैचारिक आग्रह पत्रकारिता पर हावी हो जाते हैं. लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया आवश्यक है, लेकिन केवल स्वतंत्र प्रतीत होना पर्याप्त नहीं है. विश्वसनीय और निष्पक्ष होना भी उतना ही आवश्यक है. यदि मीडिया सत्ता का प्रवक्ता बन जाए तो लोकतंत्र कमजोर होता है. लेकिन यदि मीडिया तथ्यों से कटकर केवल वैचारिक युद्ध का माध्यम बन जाए तब भी समाज का भरोसा टूटता है. यही कारण है कि प्रेस स्वतंत्रता पर बहस केवल अधिकार तक सीमित नहीं रह सकती. इसमें जवाबदेही का प्रश्न भी शामिल होना चाहिए.
यदि भारतीय संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता को स्पष्ट मान्यता दी जाती है, तो उसके साथ पत्रकारिता की नैतिक जिम्मेदारियों पर भी गंभीर विमर्श आवश्यक होगा. क्योंकि लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ अराजकता नहीं, बल्कि उत्तरदाई स्वतंत्रता है.
आज सूचना के युग में यह बहस और महत्वपूर्ण हो गई है. 21वीं सदी में सूचना ही शक्ति है. जो सूचना नियंत्रित करता है, वह समाज की सोच, राजनीतिक विमर्श और जनमत को प्रभावित करता है. सोशल मीडिया, एल्गोरिदम आधारित प्रचार, फेक न्यूज और डिजिटल दुष्प्रचार के दौर में पत्रकारिता केवल उद्योग नहीं रह गई है बल्कि इसके कुछ दुष्परिणाम भी है. वह लोकतांत्रिक असुरक्षा का केंद्रीय तंत्र बन भी चुकी है.
ऐसे में यह मांग और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है कि संविधान में “फ्रीडम ऑफ प्रेस” को स्पष्ट रूप से उपबंध किया जाए और “पत्रकार” को लोकतांत्रिक संरचना के भीतर विशेष संवैधानिक पहचान दी जाए. यह मांग किसी विशेष विचारधारा या मीडिया समूह की नहीं होनी चाहिए. यह लोकतंत्र को संस्थागत रूप से मजबूत करने की मांग होनी चाहिए. यदि प्रश्न पूछने वालों को स्पष्ट संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तो लोकतंत्र की बुनियाद धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जाएगी. निश्चित रूप से इसका अर्थ यह नहीं होगा कि मीडिया कानून से ऊपर हो. बल्कि इसका अर्थ होगा कि सत्ता किसी भी परिस्थिति में प्रेस की स्वतंत्रता को मनमाने ढंग से कुचल नहीं सकेगी. साथ ही पत्रकारिता के भीतर जवाबदेही, पारदर्शिता और नैतिक मानकों को भी अधिक गंभीरता से समाहित किया जा सकेगा.
बहरहाल, यदि चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक जैसी संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त है तो प्रेस के संवैधानिक संरक्षण पर विचार क्यों नहीं हो सकता? क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रेस को अब भी केवल न्यायिक निर्वाचन के सहारे रखना ठीक है? या फिर संविधान में स्पष्ट रूप से यह दर्ज होना चाहिए कि भारत में प्रेस स्वतंत्र है और पत्रकार लोकतांत्रिक संरचना का अभिन्न हिस्सा हैं? अब भारत को इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. क्योंकि यह केवल पत्रकारों का प्रश्न नहीं है. यह भारत के चौथे स्तंभ के संवैधानिक मान्यता प्रदान करने का प्रश्न है. यह भारत के लोकतांत्रिक भविष्य का यक्ष प्रश्न है.
नोट: लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक, ये उनके निजी विचार है. न्यूज 24 किसी भी सत्यता की पुष्टि नहीं करता है.