दादी या नानी के घर की तरफ अगर गौर किया जाए उसकी बनावट कुछ अलग मिलती है. दरवाजे, दीवारें और छत आदि को खास तरीके से डिजाइन किया जाता था. हालांकि, अब वक्त के साथ सब कुछ बदल गया है और स्मार्ट तरीके से घर को बनाया जाने लगा है. अगर आपने पुराने घर, हवेलियां या गांव के मकान देखे हैं तो एक बात जरूर नोटिस की होगी कि उनमें ज्यादातर दो पल्लों वाले बड़े-बड़े दरवाजे होते थे. आजकल जहां सिंगल डोर का चलन बढ़ गया है, वहीं पुराने समय में दो पल्लों वाले दरवाजों को खास वजहों से बनाया जाता था. यह सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि मौसम को ध्यान में रखकर तैयार किए जाते थे. 

बड़े सामान को आसानी से अंदर ले जाने के लिए

पहले के समय में घरों में बड़े-बड़े फर्नीचर, अनाज की बोरियां, बैलगाड़ी का सामान लाने-ले जाने पड़ते थे. दो पल्लों वाले दरवाजे पूरी तरह खुल जाते थे, जिससे बड़े सामान को अंदर ले जाना आसान हो जाता था. 

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रोशनी का बेहतर इंतजाम

पुराने घरों में एयर कंडीशनर या एग्जॉस्ट फैन नहीं होते थे. ऐसे में दोनों पल्ले खोलने पर रोशनी घर के अंदर आती थी. इससे घर ठंडा और हवादार बना रहता था. 

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जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल

दो पल्लों वाले दरवाजों का सबसे बड़ा फायदा यह था कि रोजाना के इस्तेमाल के लिए केवल एक पल्ला खोला जाता था. जब किसी बड़े सामान या ज्यादा लोगों का आना-जाना होता, तब दोनों पल्ले खोल दिए जाते थे.

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सैफ का भी था खास ध्यान

मजबूत लकड़ी से बने दो पल्लों वाले दरवाजों में भारी कुंडियां, लोहे की पट्टियां और मोटे ताले लगाए जाते थे. इससे घर की सेफ्टी बेहतर होती थी और दरवाजा लंबे समय तक टिका रहता था. 

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गर्मी और सर्दी से बचने के लिए 

कई पुराने घरों में लकड़ी के दरवाजे के साथ अंदर की ओर जाली या दूसरा दरवाजा भी होता था. इससे मौसम के अनुसार दरवाजे का इस्तेमाल किया जा सकता था. गर्मियों में हवा आती रहती थी, जबकि सर्दियों में ठंडी हवा को रोका जा सकता था. 

क्या आज भी बनाएं जाते हैं दो पल्लों वाले दरवाजे?

आज भी बड़े बंगले, फार्महाउस, पारंपरिक घर और कई विला में डबल डोर का इस्तेमाल किया जाता है. यह न सिर्फ अच्छे दिखते हैं, बल्कि बड़े सामान और बेहतर वेंटिलेशन के लिए भी इस्तेमाल माने जाते हैं. 

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